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Climate Change: तय मानकों पर खरे नहीं उतरते 18 राज्यों के 37 हीट एक्शन प्लान, दिल्ली का प्लान अभी तैयार नहीं

Heat Action Plans जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर हीट एक्शन प्लान (एचएपी) बनाना अब हर राज्य शहर एवं जिलों के लिए अनिवार्य हो गया है। बावजूद इसके इसे लेकर गंभीरता नहीं दिखाई देती।

By sanjeev GuptaEdited By: GeetarjunPublished: Mon, 27 Mar 2023 07:41 PM (IST)Updated: Mon, 27 Mar 2023 07:41 PM (IST)
तय मानकों पर खरे नहीं उतरते 18 राज्यों के 37 हीट एक्शन प्लान, दिल्ली का प्लान अभी तैयार नहीं

नई दिल्ली, राज्य ब्यूरो। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर हीट एक्शन प्लान (एचएपी) बनाना अब हर राज्य, शहर एवं जिलों के लिए अनिवार्य हो गया है। बावजूद इसके इसे लेकर गंभीरता नहीं दिखाई देती। दिल्ली सहित कई राज्यों, शहरों और जिलों में एचएपी बना ही नहीं है और जहां बना है, वहां भी तय मानकों का पालन नहीं किया गया है।

सेंटर फार पालिसी रिसर्च (सीपीआर) के एक नए शोध 'भारत हीटवेव के प्रति कैसे अनुकूल हो रहा?: परिवर्तनकारी जलवायु कार्रवाई हेतु निरीक्षण के साथ हीट एक्शन प्लान का आकलन’ में 18 राज्यों के 37 एचएपी का विस्तार से आंकलन किया गया है। इस शोध से पता चलता है कि देश असामान्य गर्मी (हीटवेव) से निपटने के लिए कितना तैयार है।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

  • अधिकांश एचएपी स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से नहीं बनाए गए हैं। आमतौर पर देश भर में एचएपी भीषण शुष्क गर्मी पर ध्यान केंद्रित करते हैं और उमस भरी गर्मी तथा गर्मी वाली रातों से उत्पन्न जोखिमो को अनदेखा करते हैं। अधिकांश एचएपी ने राष्ट्रीय हीटवेव की सीमाई परिभाषा को ही अपनाया है जो स्थानीय स्तर पर सामना किए जाने वाले जोखिमों के अनुकूल नही हैं।
  • 37 एचएपी में से केवल 10 में स्थानीय रूप से निर्दिष्ट तापमान सीमाओं के अनुरूप प्रतीत होता है। जलवायु अनुमान, जो भविष्य की योजना जरूरतों की पहचान करने में मदद कर सकते हैं, निवर्तमान एचएपी में एकीकृत नहीं हैं।
  • लगभग सभी एचएपी ज्यादा जोखिम वाले समूहों की पहचान करने और उन्हें लक्षित करने में असफल रहे हैं। अधिकांश एचएपी ज्यादा जोखिम वाले वर्गों (बुजुर्गों, बाहरी श्रमिकों, गर्भवती महिलाओं) की व्यापक श्रेणियों को सूचीबद्ध करते हैं जोकि उनके द्वारा प्रस्तावित समाधानों की सूची अनिवार्य तौर पर ध्यान केंद्रित नही करती है।
  • 37 में से केवल तीन एचएपी ने वित्तीय निधि (फंडिंग) स्रोतों की पहचान की है। आठ एचएपी ने कार्य-योजना संचालित करने वाले विभागों को हीं संसाधनों का स्व-आवंटन करने के लिए कहा, जोकि गंभीर वित्तीय कमी का संकेत है।
  • समीक्षा किए गए किसी भी एचएपी में कानूनी स्रोतों का संकेत नहीं है। यह एचएपी के निर्देशों को प्राथमिकता देने और उनका अनुपालन करवाने मे अधिकारियों के प्रोत्साहन को कम करता है।
  • एचएपी का राष्ट्रीय स्तर पर कोई संग्रहण नहीं है और बहुत ही कम एचएपी आनलाइन (इंटरनेट) उपलब्ध हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन एचएपी को समय-समय पर अद्यतन किया जा रहा है या नहीं और क्या यह मूल्यांकन डेटा पर आधारित है।
  • सीपीआर की यह रिपोर्ट अनुशंसा करती है कि एचएपी वित्तपोषण के स्रोतों की पहचान करें। या तो नई निधियों से या मौजूदा राष्ट्रीय और राज्य नीतियों के साथ कार्यों को जोड़कर। इसके साथ-साथ ही निरंतर सुधारात्मक रूप में कड़े एवं स्वतंत्र मूल्यांकन भी स्थापित करें।

इन राज्यों, शहरों और जिलों के हीट एक्शन प्लान का हुआ मूल्यांकन

  • शहर (नौ)- अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा, राजकोट, चंद्रपुर, नागपुर, विजयवाड़ा, भुवनेश्वर, गोरखपुर।
  • राज्य (15)- हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, झारखंड, गोवा।
  • जिला (13)- पटियाला, रेवाड़ी, राजस्थान, हजारीबाग, वेल्लोर, अकोला, बुलढाणा, गोंदिया, जलगाँव, लातूर, नांदेड़, वर्धा, वाशिम।

सीपीआर के एसोसिएट फेलो आदित्य वलियथन पिल्लै ने बताया कि भारत ने पिछले एक दशक में दर्जनों हीट एक्शन प्लान बनाकर काफी प्रगति की है। लेकिन हमारे आंकलन से कई कमियों का पता चलता है जिन्हें भविष्य की योजनाओं में दूर करने के लिए कारगर उपाय की पहचान करनी होगी।

यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो श्रम उत्पादकता में कमी, कृषि में अचानक तथा निरंतर होने वाले व्यवधानों (जैसा कि हमने पिछले वर्ष मे देखा है) और असहनीय रूप से गर्म होते शहरों के कारण आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। कारण, हीटवेव लगातार और अत्यधिक तीव्र होती जा रही हैं।


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