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2050 तक भारत में 35,000 मिलियन क्यूबिक मीटर से ज्यादा होगी गंदे पानी की मात्रा, CEEW की रिपोर्ट में दावा

भारत में अगर चुनिंदा क्षेत्रों में शोधित गंदे पानी (उपचारित अपशिष्ट जल) की बिक्री की व्यवस्था हो तो 2025 में इसका बाजार मूल्य 83 करोड़ रुपये होगा। 2050 में यह 1.9 अरब रुपये तक पहुंच जाएगा। (फाइल फोटो)

By sanjeev GuptaEdited By: Abhi MalviyaPublished: Tue, 28 Mar 2023 05:22 PM (IST)Updated: Tue, 28 Mar 2023 05:22 PM (IST)
भारत में शोधित गंदे पानी की बिक्री की व्यवस्था हो तो 2025 में इसका बाजार मूल्य 83 करोड़ रुपये होगा।

नई दिल्ली, राज्य ब्यूरो। भारत में अगर चुनिंदा क्षेत्रों में शोधित गंदे पानी (उपचारित अपशिष्ट जल) की बिक्री की व्यवस्था हो तो 2025 में इसका बाजार मूल्य 83 करोड़ रुपये होगा। 2050 में यह 1.9 अरब रुपये तक पहुंच जाएगा। यह जानकारी मंगलवार को जारी काउंसिल आन एनर्जी, इनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) की एक अध्ययन रिपोर्ट ‘रियूज आफ ट्रीटेड वेस्टवाटर इन इंडिया’ में दी गई है।

अनुमानित सीवेज उत्पादन और शोधन क्षमता के आधार पर, 2050 तक देश में कुल गंदे पानी की मात्रा 35,000 मिलियन क्यूबिक मीटर से ज्यादा रहने का अनुमान है। इसलिए इसके पुनर्उपयोग की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। 2050 तक निकलने वाले बेकार पानी के शोधन से जितना पानी मिलेगा, उससे दिल्ली से 26 गुना बड़े क्षेत्रफल की सिंचाई की जा सकती है।

क्या बताता है सीईईडब्ल्यू का अध्ययन?

सीईईडब्ल्यू का यह अध्ययन बताता है कि सिर्फ 2021 में निकलने वाले गंदे पानी के पुनर्उपयोग में 28 मिलियन मीट्रिक टन फल-सब्जी उगाने और इससे 966 अरब रुपये राजस्व पैदा करने की क्षमता थी। इसके अलावा इसमें 1.3 मिलियन टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने और उर्वरकों का इस्तेमाल घटाते हुए पांच करोड़ रुपये की बचत करने की क्षमता भी थी।

सीईईडब्ल्यू के प्रोग्राम लीड नितिन बस्सी ने कहा, “भारत में प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति 1,486 क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध है, जो इसे जल की कमी वाला देश बनाता है। ऐसे में शोधित गंदे पानी का पुनर्उपयोग बढ़ाने से ताजे जल के संसाधनों पर दबाव घटाने में मदद मिलेगी और अन्य लाभ व सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। शोधित गंदे पानी को सिर्फ सिंचाई कार्यों में उपयोग करने में ही बड़ी बाजार संभावना मौजूद हैं।”

सीईईडब्ल्यू ने अपने विश्लेषण में केंद्रीय जल आयोग के आकलनों का उपयोग किया है, जो बताता है कि 2025 तक भारत में 15 प्रमुख नदी घाटियों में से 11 को पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा। इसलिए मांग-आपूर्ति में मौजूद अंतर को भरने के लिए वैकल्पिक जल स्रोतों को खोजना जरूरी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के 2021 के आंकड़ों के अनुसार, भारत प्रतिदिन निकलने वाले कुल सीवेज के 28 प्रतिशत हिस्से काे शोधित कर पाता है, शेष अनुपचारित गंदा पानी नदी जैसे ताजे जल स्रोतों में चला जाता है।

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में पाया गया है कि भारत में अभी सिर्फ 10 राज्यों में ही गंदे पानी के शोधन और पुनर्उपयोग की नीतियां मौजूद हैं। इनमें से भी अधिकांश की नीतियों में गंदे पानी के अंतिम उपयोग कर्ताओं के लिए कोई प्रोत्साहन शामिल नहीं है, या फिर पुनर्उपयोग के विशेष उद्देश्यों के लिए गुणवत्ता मानकों को परिभाषित नहीं किया गया है।

सीईईडब्ल्यू में रिसर्च एनालिस्ट साइबा गुप्ता ने कहा, “राज्यों की नीतियों में शोधित बेकार पानी के गुणवत्ता मानकों के प्रविधान सिर्फ सुरक्षित डिस्चार्ज मानकों तक ही सीमित हैं। सभी राज्यों को विभिन्न क्षेत्रों में गंदे पानी के सुरक्षित पुनर्उपयोग के लिए शोधन के विशेष मानकों को परिभाषित करना चाहिए।”

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में यह भी सुझाव दिया गया है कि गंदे पानी को भारत के जल संसाधनों का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए। इसे जल प्रबंधन की सभी नीतियों, योजनाओं तथा विनियमों में शामिल करना चाहिए। गंदे पानी के सुरक्षित डिस्चार्ज और पुनर्उपयोग दोनों के लिए जल गुणवत्ता मानकों को अच्छी तरह से परिभाषित करने की जरूरत है। इसमें जोखिम को घटाने के दृष्टिकोण के साथ ही निश्चित समय पर समीक्षा करने की उचित व्यवस्था करना भी जरूरी है। इसके अलावा, गंदे पानी के पुनर्उपयोग के लिए शहरी स्थानीय निकायों की भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए। 


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