मुगलकालीन कला को मिल रही नई पहचान, जरी-जरदोजी से आत्मनिर्भर बन रहीं महिलाएं
दिल्ली हाट में शरद शिल्पोत्सव 2.0 के दौरान आगरा के वसीम मुगलकालीन जरी-जरदोजी कला को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे ...और पढ़ें

मुगलकालीन जरी जरदोजी की कला युवाओं को भी पसंद आ रही। जागरण
HighLights
आगरा के वसीम दिल्ली हाट में जरी-जरदोजी कला को बढ़ावा दे रहे हैं।
सौ से अधिक महिलाएं प्रशिक्षण पाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं।
जरी-जरदोजी से पर्स, बैग, वॉल हैंगिंग जैसे उत्पाद बन रहे हैं।
गौरी शर्मा, दक्षिणी दिल्ली। एक समय में शाही दरबारों और खास पोशाकों की पहचान रही मुगलकालीन जरी जरदोजी की कला आज कई शिल्पकारों को रोजगार देने और आत्मनिर्भर बनाने माध्यम बन रही है। दिल्ली हाट में चल रहे शरद शिल्पोत्सव 2.0 में आगरा के ताजगंज से आए वसीम इस कला को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
वसीम दे रहे महिलाओं को प्रशिक्षण
इस कला को जहां दोबारा पहचान मिल रही है, वहीं महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं। वसीम की कार्यशाला में महिलाओं को जरी-जरदोजी से पर्स और बैग बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। वर्तमान में करीब 100 से अधिक महिलाएं उनसे जुड़ी हैं। शिल्पोत्सव में वह इन्हीं महिलाओं के साथ तैयार किए गए उत्पाद लेकर पहुंचे हैं। जरी-जरदोजी के पर्स, बैग, वाॅल हैंगिंग और कारपेट लोगों को आकर्षित कर रहे हैं।

मोती और शीशे के बारीक डिजाइन
वसीम ने बताया कि उन्होंने यह कला अपनी माता अंजुम बेगम से सीखी है और पिछले 15 वर्ष से इससे जुड़े हैं। उनकी मां को यह कला अपनी माता तमीजन से विरासत में मिली। उनकी नानी नजीरन भी जरी-जरदोजी की माहिर कारीगर थीं। मां ने ही आगरा में अपनी कार्यशाला शुरू की जिसको अब हम लोग ही आगे लेकर चल रहे है। वसीम का कहना है कि जरी-जरदोजी में कपड़े पर रेशम के धागे, मोती और शीशे से बारीक डिजाइन बनाए जाते हैं।
कई राज्यों के महोत्सवों में ले चुके हैं भाग
इससे पर्स, बैग, कारपेट और वाल हैंगिंग तैयार किए जाते हैं। शिल्पोत्सव में इनकी मांग देखने को मिल रही है। वसीम ने बताया कि दिल्ली हाट जैसे मेलों से बिक्री के साथ बड़े ऑर्डर भी मिलते हैं। कई ग्राहक मेले के बाद भी सालभर सामान का ऑर्डर देते हैं। वह परिवार के साथ चेन्नई, गोवा, हैदराबाद, केरल, बेंगलुरु और लखनऊ के महोत्सव में भी हिस्सा ले चुके हैं।
