जागरण संवाददाता, नई दिल्ली :

आइएस आतंकियों द्वारा इराक के मोसुल में अपहृत 39 भारतीयों की हत्या मामले में केंद्र सरकार की लापरवाही के खिलाफ स्वतंत्र एजेंसी से विस्तृत जांच की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका को हाई कोर्ट ने अत्यंत असंवेदनशील करार दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल व न्यायमूर्ति सी हरिशंकर की पीठ ने कहा कि वकील द्वारा दायर की गई याचिका निंदा करने के योग्य है और यह पीड़ितों के परिजनों के प्रति असंवेदनशील है। पीठ ने याचिका के वकील मोहम्मद प्राचा पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया और आदेश दिया कि उक्त धनराशि वह चार सप्ताह के अंदर वकील कल्याण अनुदान में जमा कराएं।

केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय और खुफिया विभाग को पक्षकार बनाने वाले याची वकील महमूद प्राचा ने याचिका में कहा था कि केंद्र सरकार को पहले से ही पता था कि अपहरण किए गए भारतीयों का कत्ल किया जा चुका है, लेकिन सरकार यही बताती रही कि सभी भारतीय जिंदा हैं। जबकि आखिरकार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में खुद इस बात की पुष्टि की कि इन 39 भारतीयों की जून 2014 में मौत हो गई थी। याचिका में इस पर आपत्ति जताई गई कि जब मार्च 2018 में शवों को भारत लाया गया तो मृतक के परिजनों को शव देखने भी नहीं दिया गया। कोर्ट ने याची से पूछा कि सरकार को कब यह घोषित करना चाहिए था कि अपहृत भारतीय की मौत हो चुकी है। वहीं, केंद्र व खुफिया विभाग की तरफ से मौजूद वकील मानिक डोगरा ने कहा कि याचिका में कोई जनहित का मुद्दा नहीं है और यह खारिज किए जाने योग्य है। उन्होंने अदालत के सामने कहा कि सरकार ने किस तरह से प्रत्येक नागरिक को बचाने की दिशा में हर संभव प्रयास किया था और सरकार ने लोगों की मदद के लिए भारतीय दूतावास में हेल्पलाइन भी शुरू की थी।

पिछली तारीख पर मानिक डोगरा ने कोर्ट को बताया था कि भारत सरकार 100 फीसद पुष्टि होने तक मौत की पुष्टि नहीं कर सकती। याची महमूद प्राचा इससे पहले वर्ष 2015 में तब कोर्ट पहुंचे थे जब उन्हें इराक जाने से रोकने के लिए लुक आउट नोटिस जारी किया गया था।

Posted By: Jagran

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