न पत्थर, न सीमेंट... जिंदा जड़ों से बनते हैं मेघालय के अनोखे Living Root Bridges, अब विश्व धरोहर की दौड़ में
मेघालय के अनोखे लिविंग रूट ब्रिज, जिन्हें स्थानीय रूप से 'जिंगकिएंग जरी' कहा जाता है, यूनेस्को की विश्व धरोहर की ...और पढ़ें

मेघालय का डबलडेकर लिविंग रुट ब्रिज। सौजन्य- इंटरनेट मीडिया
HighLights
लिविंग रूट ब्रिज यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल।
खासी समुदाय की पीढ़ियों पुरानी अनूठी निर्माण तकनीक।
फाइकस इलास्टिका की जीवित जड़ों से निर्मित पुल।
वी के शुक्ला, नई दिल्ली। मनुष्य की आधी जिंदगी बीत जाने में तैयार होने वाले मेघालय के अनूठे लिविंग रूट ब्रिज (जीवित जड़ों वाले पुल) अब विश्व धरोहर की दौड़ में हैं। स्थानीय स्तर पर ‘जिंगकिएंग जरी’ कहलाने वाले इन पुलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल किया जा चुका है।
भारत ने इसके लिए 17 फरवरी 2022 को प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। प्रस्ताव में मेघालय के खासी समुदाय द्वारा पीढ़ियों से विकसित इस परंपरागत तकनीक और उससे जुड़े सांस्कृतिक परिदृश्य को शामिल किया गया है।
इन पुलों की सबसे खास बात यह है कि इन्हें पत्थर, लोहे या कंक्रीट से नहीं बनाया जाता। फाइकस इलास्टिका (भारतीय रबर वृक्ष) की जीवित जड़ों को नदी या नाले के आर-पार ले जाकर संबंधित दिशा में बढ़ाया और आपस में जोड़ा जाता है।
शुरुआत में जड़ों को बांस या सुपारी के पेड़ के खोखले तनों की मदद से दिशा दी जाती है। समय के साथ जड़ें मोटी और मजबूत होती जाती हैं। बाद में पुल में पत्थर, सीढ़ियां और रेलिंग जैसी चीजें भी जोड़ी जाती हैं।
कई पीढ़ियों का काम
लिविंग रूट ब्रिज को पूरी तरह मजबूत होने में सामान्य पुलों की तुलना में काफी अधिक समय लगता है। अलग-अलग पुलों की संरचना और देखभाल के आधार पर इन्हें उपयोगी रूप लेने में 25 से लेकर कई बार 40 वर्ष लग सकते हैं।
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कुछ बड़े और मजबूत पुलों को तैयार होने में इससे भी अधिक समय और लगातार पीढ़ियों की देखभाल की जरूरत पड़ती है। इसलिए यह केवल पुल बनाने की तकनीक नहीं, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलने वाली परंपरा है। कई स्थानाें पर इन्हें डबलडेकर भी बनाया जा रहा है।
मेघालय में इस परंपरा का संबंध मुख्य रूप से खासी और जयंतिया समुदायों से है। राज्य में ऐसे 100 से अधिक लिविंग रूट ब्रिज होने का अनुमान है। ये पुल भारी वर्षा और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में गांवों के बीच संपर्क का महत्वपूर्ण साधन रहे हैं।
इंडोनेशिया में भी मिलते हैं जड़ आधारित पुल
इस तकनीक का सबसे विकसित और प्रसिद्ध स्वरूप मेघालय में मिलता है। भारत में नागालैंड में भी कुछ लिविंग रूट ब्रिज हैं। भारत के बाहर इंडोनेशिया में सुमात्रा के जेंबातन आकर और जावा के बांतेन क्षेत्र में बदुई समुदाय द्वारा बनाए गए जड़-आधारित पुल मिलते हैं।
हालांकि मेघालय की तरह व्यापक और पीढ़ियों से चली आ रही लिविंग रूट ब्रिज की परंपरा के लिए मेघालय सबसे अधिक प्रसिद्ध है।
इसी साल मई में रूट ब्रिज को बनाने और उनके संरक्षण में अपना जीवन समर्पित करने वाले सोहरा (चेरापूंजी) के सीज गांव के किसान और पर्यावरणविद् हैली वार (69) को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने पद्मश्री से सम्मानित किया है।
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