नई दिल्ली, जेएनएन। Nirbhaya Case: निर्भया सामूहिक दुष्कर्म मामले में चारों दोषियों की फांसी एक बार फिर टल गई है। दोषियों की फांसी टलने से निर्भया की मां एक बार फिर मायूस दिखीं। कोर्ट परिसर में उन्होंने कहा कि दोषियों के वकील एपी सिंह ने मुझे चैलेंज किया है कि फांसी कभी नहीं होगी। फांसी की तारीख ऐसे ही आगे भी बढ़ती रहेगी। मीडिया से बात करते हुए वह रोने लगीं।

निर्भया की मां ने कहा दोषियों को फांसी दिलाने की लड़ाई लड़ते हुए सात साल बीत गए। लेकिन अभी तक उन्हें फांसी नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि चारों दोषियों को फांसी के फंदे पर लटकाने के लिए आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ती रहेंगी। दोषियों को हर हाल में फांसी देनी ही होगी। बता दें कि चारों दोषियों को शनिवार (एक फरवरी) को फांसी देने की तारीख तय की गई थी। लेकिन शुक्रवार को कोर्ट ने अगले आदेश तक फांसी को टाल दिया।

डेथ वारंट पर रोक के लिए दोषियों के वकील ने दायर की थी याचिका

निर्भया के दोषियों के वकील ने एक फरवरी के लिए जारी डेथ वारंट पर रोक लगाने के लिए पटियाला हाउस अदालत में याचिका दायर की थी। दोषियों के अधिवक्ता एपी सिंह की तरफ से दायर याचिका पर अदालत ने तिहाड़ प्रशासन को नोटिस जारी किया था। दोषियों के वकील एपी सिंह ने याचिका में कहा था कि फांसी पर अनिश्चितकाल के लिए रोक लगा देनी चाहिए। क्योंकि अभी दोषियों के लिए कानूनी उपाय बाकी हैं। विनय की दया याचिका राष्ट्रपति के पास विचाराधीन है। जबकि अक्षय और पवन के कानूनी उपाय भी बाकी हैं। अक्षय की दया याचिका बाकी है। पवन ने अभी तक उपचारात्मक याचिका दायर नहीं की है।

वहीं, अभियोजन पक्ष की तरफ से अदालत को बताया गया कि डेथ वारंट पर रोक लगाने के लिए जो याचिका दायर की गई है, वह कानून के साथ मजाक है। यह सिर्फ देरी करने के हथकंडे हैं। जवाब में बचाव पक्ष ने कहा कि दया याचिका खारिज होने के बाद भी अदालत में फिर से जाने के लिए दोषी को 14 दिन का समय दिया जाता है। कानून के तहत यह प्रावधान है। अब अगर विनय की दया याचिका खारिज होती है तो उसके पास भी फिर से सुप्रीम कोर्ट में जाने का अधिकार है।

एक साथ फांसी देने का है नियम

दिल्ली जेल मैनुअल के अनुसार किसी अपराध के लिए जब दोषियों को एक साथ डेथ वारंट जारी होता है, तो उन्हें फांसी भी एक ही साथ देनी पड़ती है। भले ही इस मामले में मुकेश के लिए सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, लेकिन अन्य तीन दोषियों के पास अभी कानूनी उपाय बचे हैं। 

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Edited By: Mangal Yadav