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'विषय आता था पर अंग्रेजी में अटकती है बात', हिंदी में परीक्षा देने की परमिशन न मिलने पर छोड़ना पड़ा JNU

Published: Sat, 26 Sep 2026 08:01 AM (IST)

जेएनयू के एक हिंदी माध्यम के छात्र हेमंत सिंह तोमर ने अंग्रेजी में परीक्षा देने के दबाव के कारण दर्शनशास्त्र ...और पढ़ें

छात्र हेमंत सिंह तोमर को अंग्रेजी की वजह से छाेड़ना पड़ा जेएनयू। फोटो: फाइल

छात्र हेमंत सिंह तोमर को अंग्रेजी की वजह से छाेड़ना पड़ा जेएनयू। फोटो: फाइल

HighLights

  1. जेएनयू छात्र हेमंत ने अंग्रेजी परीक्षा के दबाव में पढ़ाई छोड़ी

  2. हिंदी में परीक्षा की अनुमति न मिलने पर दाखिला रद कराया

  3. उच्च शिक्षा में भाषा बाधा और समान अवसर पर सवाल उठे

लोकेश शर्मा, नई दिल्ली। JNU में दर्शनशास्त्र की गहरी अवधारणाओं को समझने और उन पर विचार करने का सपना लेकर राजस्थान के धौलपुर से पहुंचे हिंदी माध्यम के छात्र हेमंत सिंह तोमर का आरोप है कि अंग्रेजी में पढ़ने और परीक्षा में उत्तर लिखने की कठिनाई उसके लिए इतनी बड़ी बाधा बन गई कि उसे एमए की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।

जुलाई 2026 में दर्शनशास्त्र विभाग में दाखिला लेने वाले प्रथम वर्ष के दर्शनशास्त्र के छात्र हेमंत का कहना है कि विषय की समझ होने के बावजूद अंग्रेजी में उसे अपने विचार व्यक्त करने में परेशानी होती थी।

उसने शिक्षकों से हिंदी में परीक्षा लिखने की अनुमति मांगी, लेकिन उसे राहत नहीं मिली। अंततः उसने अपना दाखिला रद करा दिया और घर लौट गया। हेमंत का कहना है कि वह छोटे शहर और हिंदी माध्यम की पृष्ठभूमि से आया है।

दर्शनशास्त्र में दाखिले के बाद उसके सामने मेटाफिजिक्स और एपिस्टेमोलॉजी (पश्चिमी), मेटाफिजिक्स और एपिस्टेमोलाॅजी (भारतीय), भारतीय नीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र और अनुभवात्मक शिक्षा जैसे विषय थे।

उसका कहना है कि इन विषयों की अवधारणाओं को समझने में उसे रुचि थी, लेकिन अंग्रेजी में पाठ्य सामग्री समझने और उत्तर लिखकर अपनी बात रखने में लगातार कठिनाई सामने आती रही।

विषय समझता था, भाषा में अटक रही थी बात

हेमंत का आरोप है कि उसने अपनी समस्या कई बार शिक्षकों के सामने रखी। उसने विभाग के चेयरपर्सन प्रो. नटराजू से भी हिंदी में परीक्षा देने की अनुमति देने का आग्रह किया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ।

इस मामले को लेकर प्रो. नटराजू से फोन काॅल और वॉट्सएप पर मैसेज बात करने की कोशिश की गई लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

हेमंत का कहना है कि हिंदी में वह दर्शन से जुड़े जटिल विचारों को विस्तार से समझा और लिख सकता था, जबकि अंग्रेजी में वही बात स्पष्ट रूप से व्यक्त करना उसके लिए मुश्किल था। इस परेशानी ने परीक्षा के दबाव को बढ़ा दिया।

उसे चिंता रहने लगी कि उसकी विषयगत समझ का आकलन उसकी अंग्रेजी लिखने की क्षमता के आधार पर न हो जाए। धीरे-धीरे स्थिति उसके लिए इतनी गंभीर हो गई कि उसने विश्वविद्यालय में पढ़ाई जारी रखने के बजाय प्रवेश रद कराने का निर्णय लिया।

भाषा की बाधा पर उठे सवाल

हेमंत का मामला उच्च शिक्षा में भाषा और समान अवसर के सवाल को सामने लाता है। वह अंग्रेजी सीखने के महत्व से इनकार नहीं करता, लेकिन उसका कहना है कि विद्यार्थी के विषय ज्ञान और विचारों का मूल्यांकन उसकी भाषा की कमजोरी से अलग होना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी मातृभाषा, घर की भाषा और स्थानीय भाषा में कठिन अवधारणाओं को समझने की सुविधा पर जोर देती है। हालांकि उच्च शिक्षा में परीक्षा माध्यम और भाषा संबंधी नियम पाठ्यक्रम व संस्थान के प्रावधानों पर निर्भर करते हैं।

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