दिल्ली में सेफ नहीं साइकिल चलाने वाले, पुलिस तक नहीं पहुंचे 97% एक्सीडेंट; IIT की स्टडी में खुलासा
दिल्ली में साइकिल हादसों का बड़ा हिस्सा पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होता है, IIT दिल्ली की एक स्टडी के अनुसार केवल 2.8% मामले ही रिपोर्ट किए जाते हैं।

दिल्ली में साइकिल से एक्सीडेंट के केस रिपोर्ट ही नहीं होते। फोटो: एआई जनरेटेड
HighLights
दिल्ली में केवल 2.8% साइकिल हादसे पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज होते हैं
सेल्फ-रिपोर्टेड हादसों में मोटरसाइकिलें टक्कर मारने वाला प्रमुख वाहन थीं
दिल्ली में साइकिल चालकों की चोट दर यूरोपीय देशों से काफी अधिक
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली में साइकिल हादसों का बड़ा हिस्सा पुलिस रिकॉर्ड तक नहीं पहुंचता है। IIT दिल्ली की स्टडी के अनुसार, पिछले साल सामने आए साइकिल हादसों में सिर्फ 2.8 प्रतिशत मामले पुलिस को रिपोर्ट किए गए। सेल्फ-रिपोर्टेड 218 हादसों में करीब आधे मामलों में मोटरसाइकिल से टक्कर थी।
साइकिल हादसों की बड़ी संख्या रिपोर्ट नहीं
‘Characteristics and Incidence Rates of Self-Reported Bicycle Crashes in Delhi: A Cohort Study’ नाम की स्टडी में दिल्ली के साइकिल चालकों से जुटाए गए सेल्फ-रिपोर्टेड आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें 844 साइकिल चालकों का पिछले साल दिल्ली के 27 स्थानों पर ऑन-रोड इंटरसेप्ट सर्वे किया गया।
इनमें से 742 साइकिल चालकों ने कम से कम एक फॉलोअप में हादसों और साइकिल चलाने से जुड़े आंकड़े दिए। इन्हें औसतन 4.8 महीने तक प्रॉस्पेक्टिव कोहोर्ट में शामिल किया गया।
आधे हादसों में मोटरसाइकिल से टक्कर
सेल्फ-रिपोर्ट किए गए 218 हादसों में आधे मामलों में मोटरसाइकिल टक्कर मारने वाला वाहन थी। इसके बाद कार 25 प्रतिशत और इलेक्ट्रिक तीन पहिया रिक्शा 11 प्रतिशत मामलों में शामिल रहे।
IIT दिल्ली के ट्रांसपोर्टेशन एंड इंजरी प्रिवेंशन रिसर्च सेंटर की सृष्टि अग्रवाल और राहुल गोयल की स्टडी में कहा गया है कि भारतीय शहरों में मोटरसाइकिलों की संख्या अधिक है। भीड़भाड़ के दौरान मोटरसाइकिलें अक्सर सड़क के किनारे वाली लेन में चलती हैं, जहां सामान्यतः साइकिल चालक भी चलते हैं।
पुलिस रिकॉर्ड में ट्रकों की हिस्सेदारी अधिक
सेल्फ-रिपोर्टेड और पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हादसों के स्वरूप में अंतर भी सामने आया। पुलिस रिकॉर्ड में टक्कर मारने वाले वाहनों में ट्रकों की हिस्सेदारी अधिक और मोटरसाइकिलों की हिस्सेदारी कम थी।
पुलिस में दर्ज सभी गैर-घातक हादसों में चोट लगी और पीड़ितों को चिकित्सकीय उपचार मिला। वहीं सेल्फ-रिपोर्टेड हादसों में 78 प्रतिशत मामलों में चोट लगी और इनमें 67 प्रतिशत लोगों ने चिकित्सा उपचार लिया।
घुटने और पैर की चोटें सबसे ज्यादा
स्टडी के अनुसार, चोटों में घुटने और निचले पैर की चोटों की हिस्सेदारी 60.4 प्रतिशत रही। इसके बाद कलाई, हाथ और उंगलियों की चोटें 27.8 प्रतिशत और सिर की चोटें 14.8 प्रतिशत रहीं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, चोट वाले हादसों की दर प्रति दस लाख किलोमीटर साइकिल चलाने पर 28.6 थी। स्टडी में इसे डेनमार्क, जर्मनी और नीदरलैंड में दर्ज दर से 60 से 200 गुना अधिक बताया गया है।
अकेले साइकिल से हादसे बेहद कम
सिर्फ दो प्रतिशत हादसे ऐसे थे जिनमें दूसरी सड़क उपयोगकर्ता शामिल नहीं था। इनमें अचानक ब्रेक लगाने या टक्कर से बचने के लिए नियंत्रण खोना, साइकिल में तकनीकी खराबी या किसी वस्तु अथवा गड्ढे से टकराना शामिल था।
शोधकर्ताओं ने कहा कि अकेले साइकिल से होने वाले हादसों की इतनी कम हिस्सेदारी ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और अमेरिका के निष्कर्षों से अलग है, जहां ऐसे हादसे 40 से 70 प्रतिशत तक होते हैं। स्टडी में इसके एक कारण के तौर पर दिल्ली में साइकिलों की अपेक्षाकृत कम गति का उल्लेख किया गया है।
साइकिल सुरक्षा के लिए स्थानीय अध्ययन जरूरी
स्टडी के अनुसार, गैर-घातक साइकिल हादसों में मोटरसाइकिलों की बड़ी हिस्सेदारी और अकेले साइकिल से होने वाले हादसों की कम संख्या, अधिक आय वाले देशों के आंकड़ों से अलग है।
शोधकर्ताओं ने साइकिल सुरक्षा से जुड़े उपायों के लिए स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर साक्ष्य जुटाने की जरूरत बताई है।
यह भी पढ़ें- दिल्ली के मंडावली इलाके में चाकू घोंपकर युवक की हत्या, जांच में जुटी पुलिस
