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जानवरों के आतंक से बदल रहा उत्तर भारत का कृषि भूगोल, मुनाफे वाली खेती छोड़ 'मजबूरी की फसल' उगाने को विवश किसान

Published: Tue, 09 Jun 2026 10:54 AM (IST)

बढ़ता मानव-पशु संघर्ष अब भारत के कृषि भूगोल को बदल रहा है, जिससे किसान पारंपरिक मुनाफे वाली फसलों को छोड़कर ...और पढ़ें

मानव-पशु संघर्ष से भारत का कृषि भूगोल बदल रहा है। इमेज एआई

मानव-पशु संघर्ष से भारत का कृषि भूगोल बदल रहा है। इमेज एआई

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। बढ़ता मानव-पशु संघर्ष अब सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि इसने भारत के कृषि भूगोल बदलना शुरू कर दिया है। प्रमुख थिंक टैंक सेंटर फार साइंस एंड एन्वासरमेंट (सीएसई) द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट स्टेट आफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026 इन फिगर्स इस संदर्भ में चौंकाने वाली जानकारी सामने रखती है।

इसके मुताबिक जंगली एवं आवारा जानवरों के आतंक से तंग आकर दिल्ली और एनसीआर सहित उत्तर भारत के किसान परंपरागत और मुनाफे वाली खेती छोड़कर ऐसे ''वैकल्पिक फसल पैटर्न'' की ओर बढ़ रहे हैं जिन्हें जानवर कम नुकसान पहुंचाते हैं।

1. हिमाचल और उत्तराखंड : नकदी फसलों से तौबा, बंजर या घास उगाने की मजबूरी

  • सब्जियां और मटर बंद : हिमाचल प्रदेश में वन विभाग के अनुसार, बंदरों और जंगली सूअरों के कारण सालाना 500 करोड़ रुपये की फसलों का सीधा नुकसान हो रहा है। इससे बचने के लिए शिमला, सोलन और सिरमौर के किसानों ने नकदी फसलें (जैसे टमाटर, शिमला मिर्च, मटर) लगाना बंद कर दिया है।
  • अदरक और लहसुन की तरफ झुकाव : बंदरों के डर से अब पहाड़ों में बड़े पैमाने पर अदरक, हल्दी और लहसुन जैसी तीखी और जमींदोज (ज़मीन के नीचे उगने वाली) फसलों का पैटर्न अपनाया जा रहा है, क्योंकि इन्हें जानवर नहीं खाते। कई इलाकों में तो किसानों ने फसलें छोड़ सिर्फ पशुओं के चारे (घास) की खेती शुरू कर दी है।

2. उत्तर प्रदेश और बिहार : दलहन और हरी सब्जियों से दूरी

उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी इलाकों में नीलगाय और आवारा पशुओं से बचने को किसानों ने दालों- सब्जियों की खेती बहुत कम कर दी है। अब वे केवल गन्ना या कड़वे स्वाद वाली फसलें उगाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। पश्चिमी यूपी के कुछ हिस्सों में किसानों ने कंटीली झाड़ियों वाले नींबू या औषधीय पौधों की खेती की तरफ रुख किया है।

3. दिल्ली और एनसीआर : नीलगायों और बंदरों के डर से बदली ''राजधानी की खेती''

देश की राजधानी के ग्रामीण इलाकों (नजफगढ़, अलीपुर, ढांसा बार्डर और बवाना) में भी फसल चक्र पूरी तरह बदल चुका है।

  • सब्जियों के गढ़ में अब सिर्फ गेहूं-धान : दिल्ली के जिन गांवों से कभी पूरी राजधानी को ताजी सब्जियां सप्लाई होती थीं, वहां अब किसानों ने सब्जियां उगाना लगभग बंद कर दिया है। नीलगायों और बंदरों के झुंडों से सब्जियों को बचाना नामुमकिन हो चुका है।
  • मजबूरी की खेती : दिल्ली के किसान अब केवल गेहूं, धान और मोटे अनाज (जैसे ज्वार-बाजरा) उगा रहे हैं। हालांकि इनमें मुनाफा कम है, लेकिन इन फसलों की सख्त प्रकृति के कारण जानवर इन्हें पूरी तरह तबाह नहीं कर पाते।
  • फूलों की खेती पर ब्रेक : दिल्ली के बाहरी इलाकों में पहले बड़े पैमाने पर गेंदा और गुलाब जैसे फूलों की खेती होती थी, लेकिन बंदरों द्वारा कलियों को तोड़ने की आदत के कारण अब किसानों ने इस पैटर्न से भी हाथ खींच लिए हैं।

क्या कहती है रिपोर्ट और विशेषज्ञ

रिपोर्ट के मुताबिक, पशुओं के हमलों के कारण देश के 54 प्रतिशत किसानों ने कम से कम एक हाई-वैल्यू (ज्यादा मुनाफे वाली) फसल उगाना हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण कहती हैं कि यह बदलाव दिखाता है कि हमारी कृषि व्यवस्था कितनी असहाय हो चुकी है। किसान अपनी पसंद की फसल नहीं उगा पा रहा, बल्कि वह फसल चुन रहा है जो जानवरों के हमलों से ''सरवाइव'' कर सके।

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