प्रदर्शनकारियों पर पुलिस एक्शन से हार्वर्ड समुदाय में मतभेद, एक गुट ने की निंदा; दूसरे ने 'घेराबंदी' पर उठाए सवाल
दिल्ली में पुलिस कार्रवाई को लेकर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी समुदाय में गहरा मतभेद है। एक समूह पुलिस ज्यादतियों की निंदा करता ...और पढ़ें

प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई।
HighLights
हार्वर्ड समुदाय दिल्ली पुलिस कार्रवाई पर गहरे मतभेद में।
एक समूह पुलिस की कथित ज्यादतियों की निंदा करता है।
दूसरा लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने पर चिंतित है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर की गई कार्रवाई से हार्वर्ड यूनिवर्सिटी कम्युनिटी के सदस्यों में गहरी फूट पड़ गई है। इस बीच दो ग्रुप ने अलग-अलग बयान जारी किए हैं।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों के एक समूह ने भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के अभियानों के खिलाफ चेतावनी जारी की है, वहीं दूसरी ओर एक अन्य समूह ने पुलिस की कथित ज्यादतियों की कड़े शब्दों में निंदा की है।
कड़ा ऐतराज जताया
संस्थानों के समर्थन में आए समूह ने दिल्ली में पुलिस की तैनाती के लिए (घेराबंदी) और उच्च संवैधानिक अधिकारियों के लिए 'चोर' या 'समझौतावादी' जैसे शब्दों के प्रयोग पर कड़ा ऐतराज जताया है।
समूह के अनुसार, इस प्रकार की बयानबाजी का मुख्य उद्देश्य लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक ढांचे में आम जनता के भरोसे को कम करना है, जो अत्यंत चिंताजनक है।
संयुक्त बयान जारी कर स्पष्ट किया
वहीं, वकीलों, पॉलिसी निर्माताओं, सिविल सेवकों, वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों समेत हार्वर्ड समुदाय से जुड़े भारतीय नागरिकों के एक बड़े हिस्से ने देश के संवैधानिक संस्थानों के खिलाफ चलाए जा रहे नकारात्मक अभियानों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। समूह ने एक संयुक्त बयान जारी कर स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हो रहे प्रहार के समय मौन रहना गैर-जिम्मेदाराना होगा।
संयुक्त बयान में कहा कि भारत के चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के कार्यालय और संसद जैसी शीर्ष संस्थाओं की साख को ठेस पहुंचाने वाले सुनियोजित अभियानों से वे बेहद चिंतित हैं। इसके साथ ही, समूह ने बिना अनुमति किसी राजनीतिक अभियान को विश्वसनीयता देने के लिए हार्वर्ड विश्वविद्यालय के नाम का इस्तेमाल किए जाने की रिपोर्टों पर भी कड़ा ऐतराज जताया है।
एजेंसियों के कामों की निष्पक्ष जांच हो
सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों के कामों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन बड़े पैमाने पर आरोप और गाली-गलौज वाली बातें सबूत, सही प्रोसेस या संस्थागत जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकतीं। सरकारी कर्मचारियों और उनके पदों की इज्जत का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
कहा गया कि संविधान, कानून के राज और नागरिक आजादी का हर समय सम्मान किया जाना चाहिए, सिर्फ तब नहीं जब यह हमारे फायदे के लिए हो। हमारा कमिटमेंट संविधान के प्रति होना चाहिए, सुविधा के लिए नहीं, न्याय के प्रति, चुनिंदा गुस्से के लिए नहीं; और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति, आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के लिए नहीं।
