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Exclusive: अस्पतालों में चल रहा बड़ा 'खेल', देशभर में दवाई-सामान और मरीजों के बिलों की समीक्षा कर रही सरकार

Published: Fri, 25 Sep 2026 08:04 AM (IST)Updated: Fri, 25 Sep 2026 08:11 AM (IST)

केंद्र सरकार अस्पतालों द्वारा दवा, चिकित्सा उपकरण और कंज्यूमेबल्स पर मरीजों से कई गुना अधिक वसूली की शिकायतों की समीक्षा कर रही है।

शिकायतों की समीक्षा करा रही केंद्र सरकार। AI जनरेटेड

शिकायतों की समीक्षा करा रही केंद्र सरकार। AI जनरेटेड

HighLights

  1. सरकार अस्पतालों में दवा-उपकरणों की अत्यधिक कीमत वसूली की समीक्षा कर रही है।

  2. अस्पताल खरीद मूल्य से अधिक दाम मरीजों से वसूल रहे हैं।

  3. समीक्षा के बाद अत्यधिक वसूली रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। अस्पतालों, विशेषकर निजी अस्पतालों में दवा, चिकित्सा उपकरण और उपचार में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स को निर्माता या बाजार से कम कीमत पर खरीदकर मरीजों से कई गुना अधिक राशि वसूलने की शिकायतों की केंद्र सरकार समीक्षा करा रही है।

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, समीक्षा में अस्पताल की वास्तविक खरीद कीमत और मरीज के बिल में दर्ज कीमत के बीच के अंतर को प्रमुखता से देखा जा रहा है। समीक्षा के निष्कर्ष के आधार पर सरकार आवश्यक कार्रवाई तय करेगी।

खरीद कीमत और बिल का अंतर बनेगा प्रमुख आधार

मंत्रालय की समीक्षा में यह देखा जा रहा है कि अस्पताल किसी सामान को निर्माता या बाजार से किस कीमत पर खरीदता है और मरीज से उसके लिए कितनी राशि वसूलता है।

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सूत्रों के अनुसार, केवल उत्पाद की अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) को आधार नहीं बनाया जाएगा। अस्पताल की वास्तविक खरीद कीमत और मरीज के बिल के बीच का अंतर भी समीक्षा का महत्वपूर्ण आधार होगा। इसी के आधार पर अस्पतालों की खरीद और बिलिंग व्यवस्था का आकलन किया जा रहा है।

महाराष्ट्र में अस्पतालों की खरीद और बिलिंग से जुड़े दस्तावेजों की जांच के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए हैं। इनमें एक अस्पताल ने आईवी सेट करीब 11 रुपये में खरीदा, जबकि मरीज के बिल में इसकी कीमत 325 रुपये तक दर्ज मिली।

इसी तरह करीब 29 रुपये में खरीदे गए कैथेटर की कीमत 310 रुपये और करीब 7 रुपये में खरीदी गई सिरिंज की कीमत 57 रुपये तक दर्ज मिली। कुछ मामलों में 40-45 रुपये में खरीदे गए नेबुलाइजर और ऑक्सीजन मास्क की कीमत मरीज के बिल में 650 से 715 रुपये तक दर्ज मिली।

मरीज के पास विकल्प सीमित

उपचार के दौरान आइवी सेट, सिरिंज, कैथेटर, ऑक्सीजन मास्क और अन्य कंज्यूमेबल्स की आवश्यकता पड़ती है। अस्पताल में भर्ती मरीज के लिए इनकी कीमत की तुलना करना या बाहर से सामान खरीदना कई बार आसान नहीं होता। ऐसे में खरीद कीमत और बिल में बड़ा अंतर होने पर उपचार का कुल खर्च बढ़ सकता है। दवाओं के मामले में अस्पताल की इन-हाउस फार्मेसी से खरीद की व्यवस्था होने पर भी मरीज की निर्भरता बढ़ जाती है।

देशभर में व्यवस्था की पड़ताल

महाराष्ट्र में सामने आए मामलों के बाद अस्पतालों में दवा, चिकित्सा उपकरण और कंज्यूमेबल्स की खरीद और मरीजों से वसूली जाने वाली राशि के बीच अंतर को लेकर मंत्रालय स्तर पर समीक्षा की जा रही है। अस्पतालों से जुड़े पक्षों के साथ इस विषय पर बातचीत भी की जा रही है। ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाने के विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।

अस्पतालों की लागत का भी रखा जा रहा ध्यान

अस्पताल संचालकों का तर्क है कि खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली राशि के अंतर को सीधे मुनाफा नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार इसमें सामान के भंडारण, स्टाफ, संक्रमण नियंत्रण, आपूर्ति व्यवस्था और अन्य परिचालन लागत भी शामिल होती हैं।

मंत्रालय की समीक्षा में इन लागतों को भी ध्यान में रखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, समीक्षा पूरी होने के बाद निष्कर्ष के आधार पर मरीजों से होने वाली अत्यधिक वसूली को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक व्यवस्था और कदम तय किए जाएंगे।

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