650 करोड़ दवा घोटाला: पेमेंट तो हुआ लेकिन दवा और उपकरण अस्पतालों तक पहुंचने के साक्ष्य 'गायब', नहीं मिल रहे रिकॉर्ड
दिल्ली में 650 करोड़ के दवा और चिकित्सा उपकरण खरीद घोटाले की स्टॉक ऑडिट में केंद्रीय खरीद एजेंसी और अस्पतालों के रिकॉर्ड में भारी अंतर पाया गया है।

स्टाॅक ऑडिट में केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) के माध्यम से हुई खरीद और सरकारी अस्पतालों के रिकाॅर्ड का मिलान मेल नहीं खा रहा है। एआई इमेज
HighLights
650 करोड़ दवा खरीद घोटाले में रिकॉर्ड मेल नहीं खा रहे।
केंद्रीय खरीद एजेंसी और अस्पतालों के स्टॉक में भारी अंतर।
भुगतान किए गए सामानों की भौतिक उपलब्धता पर सवाल।
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। दिल्ली के 650 करोड़ के दवा एवं चिकित्सा उपकरण खरीद घोटाले की चल रही स्टाॅक ऑडिट में केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) के माध्यम से हुई खरीद और सरकारी अस्पतालों के रिकाॅर्ड का मिलान मेल नहीं खा रहा है। सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना है कि जिन दवाओं और उपकरणों का भुगतान किया गया, वे वास्तव में अस्पतालों तक पहुंचे भी या नहीं? उनका स्टाॅक दर्ज किया गया या नहीं? उनका उपयोग मरीजों के उपचार में हुआ या नहीं? इनमें से किसी भी सवाल का जवाब नहीं मिल पा रहा है।
खरीद के हर चरण की जांच तेज
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के निर्देश और सरकार की जीरो टाॅलरेंस नीति के कारण जांच का फोकस अब केवल यह देखने तक सीमित नहीं है कि टेंडर किसे मिला और भुगतान किसे हुआ, बल्कि यह भी पता लगाया जा रहा है कि जिन सामानों की खरीद दिखाई गई, उनका भौतिक अस्तित्व क्या है।
यदि सामान अस्पतालों तक पहुंचा, तो उसका उपयोग किस विभाग में हुआ, कितना स्टाॅक बचा है और क्या उसका पूरा लेखा-जोखा उपलब्ध है। यदि रिकाॅर्ड में अंतर पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों और सप्लायरों की भूमिका की भी जांच की जाएगी।
सरकारी अस्पतालों से मांगे गए मूल रिकाॅर्ड
स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों अनुसार, इसे लेकर खरीद प्रक्रिया की पूरी सप्लाई चेन की जांच की जा रही है, खरीद आदेश, सप्लाई ऑर्डर, डिलीवरी चालान, निरीक्षण रिपोर्ट, अस्पतालों के स्टाॅक रजिस्टर, वितरण रिकाॅर्ड, उपयोग का ब्योरा और भुगतान संबंधी दस्तावेजों का एक-दूसरे से मिलान किया जा रहा है। कई सरकारी अस्पतालों से मूल रिकाॅर्ड तलब किए गए हैं, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि खरीद और वास्तविक आपूर्ति के बीच विसंगति कहां पर है।
दस्तावेजों की भी पड़ताल की जा रही
जांच के दौरान कई अस्पताल भी दायरे में आ गए हैं। जीबी पंत अस्पताल में 15 करोड़ से अधिक की अनियमितताओं के आरोपों की जांच भी इसी का हिस्सा है। लोकनायक अस्पताल में 17.70 करोड़ रुपये के टेंडर को लेकर अनियमितताओं की जांच पहले से जारी है, जबकि गुरु तेग बहादुर अस्पताल में दवा और उपकरण खरीद से जुड़े दस्तावेजों की भी पड़ताल की जा रही है।
जांच में अब भौतिक सत्यापन की बारी
दिल्ली हाई कोर्ट के सरकारी अस्पतालों में वर्षों से निष्क्रिय पड़े चिकित्सा उपकरणों की अस्पतालवार सूची तैयार करने और उनके उपयोग की स्थिति का विवरण मांगे जाने से जांच को नई तेजी मिल गई है। स्वास्थ्य विभाग के जानकारों का कहना है कि इस जांच का सबसे महत्वपूर्ण चरण अब भौतिक सत्यापन है।
इसी कारण पूरे खरीद तंत्र की चरणबद्ध तरीके से जांच हो रही हैं। इससे यह उजागर हो सकेगा कि 650 करोड़ के दवा व उपकरण खरीद घोटाले का दायरा केवल सीपीए तक सीमित था या इसकी कड़ियां सरकारी अस्पतालों के भीतर तक फैली हुई थीं?
