16 साल पुराने रेप केस में दिल्ली HC का बड़ा फैसला, रद की 7 साल की सजा; फोरेंसिंग जांच ने धोया माथे का दाग
दिल्ली हाई कोर्ट ने 16 साल पुराने दुष्कर्म मामले में एक व्यक्ति की सजा रद कर दी है। यह फैसला ...और पढ़ें

16 साल पुराने रेप केस में दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला। फोटो: आर्काइव
HighLights
हाई कोर्ट ने 16 साल पुराने दुष्कर्म मामले में सजा रद की
शिकायतकर्ता के बयान और फोरेंसिक रिपोर्ट में मिलीं विसंगतियां
वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को बरी किया गया
विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। दुष्कर्म के 16 साल पुराने मामले में वैज्ञानिक साक्ष्यों ने एक व्यक्ति पर लगे दुष्कर्म के दाग को धो दिया। सात साल की सजा सुनाने संबंधी ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता महिला के बयान और वैज्ञानिक साक्ष्यों में विसंगतियां हैं।
अपीलकर्ता को रिहा करने का आदेश देते हुए न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की पीठ ने कहा कि पूरा मामला मुख्य रूप से शिकायतकर्ता महिला के बयान पर टिका था।
पीठ ने टिप्पणी की कि दुष्कर्म के मामले में सजा सिर्फ महिला के बयान के आधार पर हो सकती है, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने इस सिद्धांत को गलत तरीके से समझा कि बिना पुष्टि वाले बयान की आंतरिक विश्वसनीयता की जांच करने की जरूरत नहीं है।
रिकॉर्ड पर पेश हुए साक्ष्यों को देखते हुए पीठ ने कहा कि फोरेंसिक साक्ष्यों के सामने शिकायतकर्ता महिला के बयान गलत साबित हुए। महिला ने कहा था कि यौन उत्पीड़न के दौरान उसके कपड़े खून से लथपथ हो गए थे, जबकि फोरेंसिक रिपोर्ट में उसके कपड़ों पर कोई खून नहीं मिला था।
बयान और वैज्ञानिक साक्ष्यों में विरोधाभास
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अपीलकर्ता व्यक्ति ने महिला को दिल्ली के एक बाजार से जबरदस्ती लेकर उत्तर प्रदेश गया और वहां पर उसे चार दिनों तक बंधक बनाकर रखा। इतना ही नहीं उसने महिला का यौन उत्पीड़न किया गया।
हालांकि, पीठ ने कहा कि महिला ने बयान दिया था कि घटना वाली जगह पर कोई भीड़ नहीं थी, जबकि अभियोजन पक्ष के एक अन्य गवाह ने बाजार में भीड़ होने की बात कही।
मेडिकल बयान से भी उठे सवाल
कोर्ट ने यह भी रिकॉर्ड किया कि पुलिस सुरक्षा व आरोपी की गैरमौजूदगी में एक मेडिकल अधिकारी को दिए अपने बयान में महिला ने कहा था कि वह माता-पिता के दबाव के कारण घर से निकली थी।
उसने यह भी कहा था कि उसके साथ कोई शारीरिक या यौन उत्पीड़न नहीं हुआ था और वह खुद वापस आ गई थी।
खून के निशान नहीं मिलने पर सजा रद
महिला ने यह भी कहा था कि उत्पीड़न के दौरान उसके कपड़े खून से लथपथ हो गए थे, जबकि फोरेंसिक रिपोर्ट में उसके कपड़ों पर कोई खून नहीं मिला। उक्त तथ्यों को देखते हुए पीठ ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करने में स्पष्ट गलती की थी और सजा को रद किया जाता है।
