विदेश में मास्टरमाइंड, हरियाणा-यूपी के नाबालिग शूटर... कानून की कमजोरी या हमारी अनदेखी; आखिर कहां है चूक?
भारत में युवा आबादी 'रिमोट कंट्रोल क्राइम' सिंडिकेट का हिस्सा बन रही है, जहाँ विदेश या जेलों से संचालित गैंग्सटरों ...और पढ़ें

हरियाणा यूपी के नाबालिग शूटरों से कराई जा रही वारदात। फोटो: एआई जनरेटेड
HighLights
युवाओं का इस्तेमाल कर विदेश से संचालित हो रहे अपराध।
जेलें बन रही हैं अपराधियों के लिए सुरक्षित संरक्षण केंद्र।
जुवेनाइल एक्ट में संशोधन की तत्काल आवश्यकता है।
मनु त्यागी, नई दिल्ली। हमारी युवा आबादी अब 'क्राइम सिंडिकेट’ की ढाल बनती जा रही है। बीते कुछ समय से देश के महानगरों में जिस तरह से वर्चस्व के लिए, अपना रौब दिखाने के लिए किसी न किसी को निशाना बनाया जा रहा है, ये सिर्फ किसी कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और प्रशासनिक तंत्र की लचरता और अन्यमनस्कता की ही कलई खोलने वाला है।
मुंबई के जुहू इलाके में बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर हुई ताबड़तोड़ फायरिंग की हालिया घटना इन्हीं कारणों को तो परिलक्षित करती है। यह वारदात केवल मुंबई के जूह में नहीं हुई, इसमें सबसे अहम चिंता और विचार का विषय ये है कि इसके तार सोनीपत जिले के देहाती अंचलों तक जुड़े हुए हैं।
अपराध कहीं भी होता है लेकिन उसे अंजाम देने वाले, इसके पीछे उनकी जो मंशा सामने आती है वो इस समाज और सिस्टम दोनों पर ही सवाल है। कोई नौवीं फेल, कोई दुकान पर मामूली सेल्समैन, तो कोई वेल्डिंग का काम कर रहा है।

अपने ऊपर हुए हमले के बाद अभिनेता टाइगर श्रॉफ। फोटो: आर्काइव
सोनीपत के देवड़ू, हरसाना और बहालगढ़ जैसे गांवों से गिरफ्तार इन युवाओं की पृष्ठभूमि बस इतनी ही थी। मगर इंटरनेट मीडिया ने इन्हें अमेरिका में बैठे गैंग्सटर और जेलों से सक्रिय सिंडिकेट्स के लिए टूल बना दिया।
बुनियादी जरूरतें और पैसों का लालच इन नाबालिग, किशोरों को इस कदर अंधा कर देता है कि ये चंद रुपयों के लिए अपना जमीर बेचकर अपराध का रास्ता चुनते हैं।
एक तरफ देश के युवा आत्मनिर्भर बन रहे हैं, आर्थिक रूप से कमजोर युवा भी अपना भविष्य बना दूसरों को रोजगार देने वाले बन रहे हैं, दूसरी तरफ एक बड़ा युवा वर्ग आज भी ऐसे आपराधिक जाल में फंस रहा है।
ये कोई अकेली घटना नहीं है
यह कोई अकेली घटना नहीं है। इससे ठीक पहले फिल्म निर्माता रोहित शेट्टी के घर पर रंगदारी के लिए हुई गोलाबारी, अभिनेता सलमान खान के आवास के बाहर की गई फायरिंग और राकांपा नेता बाबा सिद्दीकी की सरेआम निर्मम हत्या की कड़ियों में भी ठीक इसी 'पैटर्न' का इस्तेमाल हुआ था।

सलमान खान के घर पर हमले के बाद उनसे मिलने पहुंचे एकनाथ शिंदे। फोटो: आर्काइव
आए दिन दिल्ली सहित एनसीआर के शहरों में भी कारोबारियों से भी रंगदारी मांगने, उनके घर, दफ्तर पर फायरिंग कराने की घटनाएं होती हैं। इन सब साजिश के किंगपिन सूत्रधार विदेश या भारत की जेलों में बैठे हैं।
अपराध की कमान जेलों की कालकोठरियों से निशाना तय कर रही है और ट्रिगर दबाने वाले मोहरे उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब के ग्रामीण इलाकों के वो बेरोजगार, कमजोर या नाबालिग लड़के हैं जिनका कोई पुराना बड़ा आपराधिक इतिहास भी नहीं रहा है।

रोहित शेट्टी के घर के बाहर फायरिंग की गई। फोटो: आर्काइव
अपराध का यह बदलता हुआ 'रिमोट-कंट्रोल' स्वरूप हमारे सामाजिक ताने-बाने को भीतर से खोखला कर रहा है, जिस पर अब केवल पुलिस की सजगता नहीं, बल्कि नीतिगत और सामाजिक स्तर पर एक बड़े प्रहार की जरूरत है।
अपराध की रीढ़, सिस्टम की कमजोरी
टाइगर श्रॉफ मामले ने एक बार फिर साबित किया है कि वारदात को अंजाम देने वाला शूटर तो मौके पर या भागते हुए पकड़ा जाता है, लेकिन उस हत्या की साजिश रचने वाला मास्टरमाइंड भारत से हजारों किलोमीटर दूर किसी अन्य देश में सुरक्षित बैठा होता है।
यही तो 'रिमोट कंट्रोल क्राइम' क्राइम है। पूरी तरह से आधुनिक तकनीक पर टिका है। वाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल और थ्रेमा जैसे एप्स ने पारंपरिक फोन कॉल्स की जगह ले ली है।
इन एप्स पर होने वाली कॉलिंग और चैटिंग 'एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड' होती है, जिसे हमारी जांच एजेंसियां आसानी से इंटरसेप्ट (ट्रेस) नहीं कर पातीं। विदेश में बैठा गैंग्सटर इंटरनेट कॉलिंग के जरिये भारत में बैठे अपने शूटरों को निर्देश देता है।

टाइगर श्रॉफ पर हमला करने वाले पकड़े गए। फोटो: आर्काइव
जबरन वसूली का जो पैसा भारत में व्यापारियों से लिया जाता है, उसे बैंक खातों में नहीं जमा किया जाता। वह पैसा 'हवाला' के जरिये या फिर बिटकॉइन और अन्य क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर विदेश में बैठे गैंग्सटर तक पहुंचता है।
इस वित्तीय लेन-देन का कोई डिजिटल फुटप्रिंट या ट्रेल सामान्य बैंकिंग सिस्टम में नहीं दिखता, जिससे मनी ट्रेल का पता लगाना नामुमकिन हो जाता है। टाइगर श्रॉफ मामले में भी, कुणाल ने अमृतसर से हथियार उठाए, दो महिलाएं राधा और बबीता ने उसे ट्रेन से मुंबई पहुंचाया और शूटरों को यह तक नहीं पता था कि हथियार देने वाले असल में कौन हैं।
इन कडि़यों की वजह से अगर पुलिस एक मोहरे को पकड़ भी ले, तो मुख्य सरगना तक पहुंचने वाली कड़ियां बीच में ही टूट जाती हैं। ये ठीक वैसा ही पैटर्न है जो आतंकी संगठनों द्वारा स्लीपर सेल के रूप में काम करता था, वही डिजिटल स्लीपर सेल के रूप में गैंग्सटर तक की मोडस ऑपरेंडी बन रहा है।
बम की धमकियां देने वालों का भी पता नहीं
यही आधुनिक ‘रिमोट कंट्रोल’ आए दिन कभी स्कूल, सार्वजनिक स्थल, सरकारी कार्यालय, विमान आदिक को बम से उड़ाने की धमकी भरी सूचनाओं वाले घटनाक्रमों में भी देखने को मिल रहा है।
दो-ढाई साल से बम की झूठी सूचना वाली इन धमकियों के प्रकरण से अब तो ऐसा लगता है कि पुलिस भी मान बैठी है, कि इसका कोई तोड़ मिलने वाला नहीं है, क्योंकि हर बार अंधेरे में तीर चलाने जैसी ही प्रतिक्रिया पुलिस की ओर से जारी होती है कि इस मामले में ई-मेल कहां से आया, किसने किया उसका पता लगाया जा रहा है।

दिल्ली एनसीआर के स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकियां मिल रहीं। फोटो: आर्काइव
चूंकि इस ई-मेल के सोर्स में कहीं विदेश का जिक्र होता है, वीपीएन सिस्टम यानी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क सिस्टम से किया गया होता है तो पुलिस उसकी जड़ तक कभी पहुंच ही नहीं पाती और आज तक कभी इसीलिए ऐसे प्रकरणों में इक्का दुक्का छोड़ दें तो कोई मामला वर्क आउट नहीं हुआ।
गैंग्सटर का आधुनिक नेटवर्क और इस तरह की साइबर थ्रेड कभी भी किसी दिन बड़े घातक हमले का आधार बन सकती हैं। बचपन में एक कहानी शेर आया, शेर आया वाली सभी ने पढ़ी-सुनी होगी, लेकिन शेर असल में एक दिन आ ही जाता है। आपराधिक घटनाएं भी ऐसे ही किसी दिन हो जाती हैं।
बदलती मोडस ऑपरेंडी, जेलों का बढ़ता संरक्षण
किसी भी गैंग्सटर संगठन का जन्म अब पारंपरिक तरीके से गलियों की आपसी रंजिशों से नहीं होता। आज के दौर में इन अपराधियों ने कॉरपोरेट जगत की तरह काम करना शुरू कर दिया है।
इनका पनपना कानून व्यवस्था की तकनीकी खामियों और असीमित अवैध फंडिंग पर निर्भर करता है। इन संगठनों की रीढ़ जबरन वसूली ही है। रीयल एस्टेट कारोबारी, बड़े सटोरिये, फिल्म इंडस्ट्री के लोग और नामी व्यापारी इनके प्राथमिक निशाने पर होते हैं।
इनकी वसूली की रकम केवल हथियारों की खरीद में नहीं जाती, बल्कि इसका एक बड़ा हिस्सा मुखबिरों का नेटवर्क तैयार करने, कानूनी लड़ाई लड़ने (महंगे वकीलों की फीस) और जेल के भीतर अपने आकाओं के लिए सुविधाएं जुटाने में खर्च होता है।
एक और अहम बदलाव दिखता है, पहले गैंग्सटर कट्टा, पिस्टल यानी हथियार रखने, उसका रौब रखने वर्चस्व जमाने तक सीमित होते थे, अब उनका नेटवर्क ड्रग्स तस्करी, हथियारों की अवैध सप्लाई, मानव तस्करी और जाली नोटों के कारोबार में सिर्फ देश ही नहीं विदेश तक इनका सिंडिकेट होता है।
जेल भी नहीं रोक पा रहीं अपराध
अब हम इसकी वजह तलाशें तो इसका सबसे मूल आधार और अपराध जगत का कटु सत्य यही है कि आज भी जेलें अपराधियों के लिए सुधार गृह नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित 'सरंक्षण केंद्र’ बन चुकी हैं।
सलाखों के पीछे बैठा गैंग्सटर पुलिस की सीधी पहुंच और विरोधी गैंग के हमलों से सुरक्षित होता है और वहीं से वह अपने पूरे साम्राज्य को संचालित करता है।
चूंकि सोचने वाली बात है, आखिर जेलों में इतनी आसानी से मोबाइल, सिम कार्ड कैसे उपलब्ध हो जाते हैं, अब ये खुद दीवार फांदकर तो पहुंच नहीं सकते, निश्चित ही जेल प्रबंधन की सहमति से उनके संरक्षण से ही सब सुविधा वहां पहुंच रही हैं।

जेल के अंदर से सिंडिकेट चला रहा गैंग्सटर लॉरेंस बिश्नोई। फोटो: आर्काइव
अदालतों में पेशी के दौरान या जेल में मुलाकात के नाम पर ये अपराधी अपने वकीलों और खास गुर्गों के जरिये बाहर संदेश भेजते हैं। जेलें नए और छोटे अपराधियों के लिए 'क्राइम सेंटर्स' की तरह काम करती हैं।
चोरी या छोटे-मोटे झगड़े में जेल आया कोई युवा जब वहां बड़े गैंग्सटर के संपर्क में आता है, तो वह जेल से बाहर एक पेशेवर अपराधी बनकर निकलता है। बड़े गैंग्सटर इन युवाओं की काउंसिलिंग करते हैं, उन्हें अपने गैंग में शामिल करते हैं और बाहर निकलते ही उन्हें काम सौंप देते हैं।
हम जेलों में आधुनिक सुरक्षा, संरक्षण के दावे करते हैं, लेकिन आज भी 5जी नेटवर्क को ब्लाक करने वाले आधुनिक जैमर्स, कैदियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए AI आधारित सीसीटीवी कैमरे और जेल स्टाफ का नियमित बदलाव और जांच जरूरी है।
कहने का मतलब यही है कि जेल सुरक्षा को लेकर भी जब तक जीरो टॉलरेंस वाली नीति नहीं होगी तब तक गैंग्सटर के नेटवर्क को ध्वस्त करने की जीरो टॉलरेंस नीति के भी सफल होने पर संदेह है।
अब जुवेनाइल एक्ट में संशोधन समय की जरूरत
देश में हाल के वर्षों में हुई कई हाई-प्रोफाइल हत्याओं और गोलीबारी की घटनाओं में जो शूटर पकड़े गए, उनमें से अधिकांश की उम्र 15 से 17 वर्ष के बीच थी।
गैंग्सटर भली-भांति जानते हैं कि भारतीय कानून के मुताबिक, 18 साल से कम उम्र के अपराधियों को बालिगों की तरह जेल में नहीं रखा जा सकता। उन्हें अधिकतम तीन साल के लिए बाल सुधार गृह भेजा जाता है, जहां से वे आसानी से बाहर आ जाते हैं।
इसके अलावा, नाबालिगों का कोई स्थायी पुलिस रिकॉर्ड भी उस तरह से नहीं बनता जो उनके पूरे भविष्य को प्रभावित करे। गैंग्सटर इस कानूनी सहूलियत को एक 'बिजनेस मॉडल' की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

नाबालिगों से अपराध अंजाम कराए जा रहे हैं। फोटो: सांकेतिक
वे जरूरतमंद और भटके हुए नाबालिगों को चुनते हैं, उन्हें कुछ हजार रुपये और महंगे मोबाइल का लालच देते हैं और उनके हाथों में आधुनिक हथियार थमा देते हैं।
अब सबसे जरूरी यही है, जिस तरह निर्भया सामूहिक दुष्कर्म घटनाक्रम के बाद 16 से 18 वर्ष के बीच की आयु के किशोर द्वारा कोई जघन्य अपराध किया जाता है, तो उसकी मानसिक और शारीरिक क्षमता की जांच के बाद उसे सामान्य अदालत या किशोर न्याय बोर्ड के फैसले के अनुसार वयस्क की तरह ट्रीट किया जा सकता है।
अब समय आ गया है कि इस तरह गैंग्सटर के साथ मिलकर नशा तस्करी, हत्या जैसे जघन्य अपराध कर रहे नाबालिगों पर मुकदमा कर वयस्क की तरह कार्रवाई का प्रावधान हो।
सिंडिकेट जहां एक बड़ी चुनौती बना
इसमें कोई दोराय नहीं, अपराधियों का सिंडिकेट जहां एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, वहीं केंद्रीय गृह मंत्रालय की नीति और सुरक्षा एजेंसियों की समन्वित कार्रवाई भी हो रही है।
दो दिन पहले ही अमेरिका के लास वेगास से मोस्ट-वांटेड गैंग्सटर हिमांशु भाऊ और नीरज फरीदपुरिया की गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण भी हैं। लगभग दो साल के अंतराल में राष्ट्रीय जांच एजेंसी, दिल्ली पुलिस और विभिन्न राज्यों की स्पेशल टास्क फोर्स सीमा पार से चल रहे पूरो इकोसिस्टम की रीढ़ को कमजोर करने में लगी है।

विदेश में बैठकर गिरोह चला रहा गैंग्सटर हिमांशु भाऊ। फोटो: आर्काइव
गृह मंत्रालय के प्रमाणित आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक 51 कुख्यात अपराधियों को विदेश से प्रत्यापित कराकर भारत लाया जा चुका है। ड्रग्स, हथियार तस्करी और आतंकियों के साथ बढ़ते गैंग्सटर के गठजोड़ पर भी कानूनी कार्रवाई हो रही हैं।
लेकिन अभी भी 28 प्रमुख गैंग्सटर रडार पर हैं, जिनमें नौ कनाडा, पांच अमेरिका में हैं। कुछ देशों के राजनीतिक गतिरोध और ढीले प्रत्यर्पण कानूनों के कारण अपराधियों को कानूनी प्रक्रिया के तहत लाना आज भी कूटनीतिक चुनौती है।
फिर भी दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, कूटनीतिक अनुभवों और आधुनिक तकनीक की संपन्नता से भारत संगठित अपराध के खिलाफ जरूर इससे पार पाएगा।
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