मुफ्त दवा का लालच देकर चुराया बायोमेट्रिक, फर्जी हेल्थ कैंप लगाकर बेचे 3000 सिम; मथुरा से 2 शातिर गिरफ्तार
मथुरा में फर्जी हेल्थ कैंप लगाकर ग्रामीणों के आधार और बायोमेट्रिक डेटा से 3000 से अधिक सिमकार्ड एक्टिवेट कर साइबर अपराधियों को बेचने वाले दो आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं।
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दिल्ली पुलिस ने दो आरोपियों को किया गिरफ्तार। फोटो: सांकेतिक
HighLights
फर्जी हेल्थ कैंप से ग्रामीणों का बायोमेट्रिक डेटा चुराया।
3000 से अधिक सिमकार्ड एक्टिवेट कर साइबर अपराधियों को बेचे।
'डिजिटल अरेस्ट' सहित 2.64 करोड़ की ठगी में उपयोग।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। फर्जी हेल्थ कैंप लगाकर ग्रामीणों के आधार कार्ड और बायोमेट्रिक विवरण चुराकर उक्त जानकारियों से विभिन्न मोबाइल कंपनियों के सिमकार्ड एक्टिवेट कर देश-विदेश के साइबर अपराधियों को बेचने वाले दो आरोपियों को इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (आईएफएसओ) ने मथुरा से गिरफ्तार किया है।
दोनों पिछले एक साल में तीन हजार से अधिक सिमकार्ड एक्टिवेट कर चुके हैं, जिनका इस्तेमाल ''डिजिटल अरेस्ट'' व अन्य साइबर ठगी में किया जा रहा था।
इस सिंडिकेट का लिंक नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज करीब 2.64 करोड़ की ठगी से जुड़ी शिकायतों से मिला है।
डिजिटल अरेस्ट के मामले से मिला सुराग
डीसीपी आईएफएसओ गौरव त्यागी का कहना है कि इस कारनामे की जानकारी डिजिटल अरेस्ट के मामले में दर्ज कराई गई शिकायत की जांच से मिली।
श्रीनिवास नाम के एक व्यक्ति ने इसी साल आईएफएसओ में दर्ज कराई शिकायत में बताया था कि उन्हें कानूनी कार्रवाई और केस का डर दिखाकर ठगों ने दो हफ्तों तक डिजिटल अरेस्ट रखकर उनसे छह आरटीजीएस ट्रांजक्शन के जरिए 1.64 करोड़ ठग लिए थे।
एसीपी विवेकानंद झा व एसआई अमित वर्मा की टीम मोबाइल नंबरों और डिवाइस डाटा के तकनीकी विश्लेषण के बाद मथुरा-वृंदावन पहुंची।
20-21 अक्टूबर की रात दोनों को सदर थाना अंतर्गत ग्राम कोटा से गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार आरोपियों में जितेंद्र सिंह व ब्रजेश कुमार दोनों फतिहा, मथुरा के रहने वाले हैं।
फर्जी हेल्थ कैंप लगाकर जुटाते थे बायोमेट्रिक
पूछताछ से पता चला कि ये लोग प्रतिदिन 20 से 30 सिम एक्टिवेट कर ऑनलाइन सप्लाई करते थे। आरोपी गांवों में सस्ती दवाओं का लालच देकर फर्जी हेल्थ कैंप लगाते थे।
दवाओं और सरकारी योजनाओं के नाम पर ग्रामीणों से उनके आधार कार्ड व बायोमेट्रिक (फिंगरप्रिंट) डिटेल्स ले लेते थे। इन्हीं फर्जी पहचान-पत्रों पर वे फिजिकल सिमकार्ड लेकर फिर उन्हें ई-सिम में बदलकर क्यूआर कोड जनरेट कर लेते थे।
दो हजार रुपये में बेचते थे ई-सिम
ई-सिम और क्यूआर कोड टेलीग्राम, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर दो हजार रुपये प्रति सिम के हिसाब से बेच देते थे। इसके बदले आरोपियों को क्रिप्टोकरेंसी में पेमेंट मिलता था।
जांच में सामने आया है कि आरोपी विदेशी साइबर अपराधियों और ग्रुप्स के भी संपर्क में थे। इन सिम का इस्तेमाल डिजिटल अरेस्ट और सिम बॉक्स सिस्टम में किया जाता था।
पुलिस से बचने के लिए आरोपी लगातार अपने मोबाइल बदलते रहते थे और पुराने फोन को नष्ट कर देते थे।
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