दिल्ली घूम आए, फिर भी नहीं देखा असली इतिहास! NCR की इन जगहों में छिपी हैं अनसुनी गाथाएं
Delhi NCR Tourist Places: दिल्ली-एनसीआर में कई ऐसे ऐतिहासिक, आध्यात्मिक व आधुनिक स्थल हैं जिनकी गाथाएं अब भी अनसुनी हैं। विश्व पर्यटन दिवस पर पढ़ें सबरंग का यह लेख...

खंडसा गांव का छोटा-सा एकलव्य मंदिर पौराणिक इतिहास के साथ बड़ी कथाओं को समेटे हुए हैं।
HighLights
खंडसा गांव में स्थित है एकलव्य का पौराणिक मंदिर।
रेवाड़ी में है भारत का एकमात्र हेरिटेज स्टीम लोको शेड।
कुतुब मीनार परिसर में स्थित है 1600 साल पुराना लौह स्तंभ।
प्रियंका दुबे मेहता, नई दिल्ली। दिल्ली का समृद्ध इतिहास, इसकी आध्यात्मिक गहराई और आधुनिकता की छटा इसे दुनिया के सबसे अनोखे और जीवंत शहरों में से एक बनाती है।
पर्यटक जब दिल्ली आते हैं तो वो सिर्फ इसकी छटा या राजनीतिक स्वरूप नहीं देखते, इसका इतिहास देखते हैं, उसकी परतों में छिपा शहर का संघर्ष देखते हैं, इसके बार बार उजड़ने और फिर से उठ खड़े होने के जज्बे को इसको स्मारकों, इसके पर्यटन स्थलों में छिपी गाथाओं को जानकर समझते हैं।
आज सबरंग के अंक में विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर उन स्थलों के बारे में बता रही हैं जो पर्यटन के लिहाज से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को इतिहास, आध्यात्म और आधुनिकता के एक अहम स्थान पर खड़ा करती हैं, कुछ जिन्हें पर्यटन विभाग में महत्व दिया है और कुछ वे जिनका बहुत ज्यादा प्रचार प्रसार नहीं हो सका...
खंडसा गांव में है एकलव्य का मंदिर
जब गुरुदक्षिणा के उच्चतम स्तर की बात आती है तो एकलव्य का नाम लिया जाता है। हम तो केवल नाम लेते हैं लेकिन दिल्ली से सटे गुरुग्राम में एकलव्य का एक मंदिर भी है। जी हां, मान्यताओं के अनुसार यहां के खंडसा गांव का छोटा-सा एकलव्य मंदिर पौराणिक इतिहास के साथ बड़ी कथाओं को समेटे हुए हैं।
'गुड़गांव बिटवीन मैमरी एंड माडर्निटी' पुस्तक में विकास आर्या ने लिखा है कि गुरुग्राम के बढ़ते शहरीकरण के कारण यहां के छोटे-बड़े गांव अपनी पारंपरिक पहचान खोते जा रहे हैं। कहा जाता है कि एकलव्य का अंगूठा इसी स्थान पर गुरु द्रोणाचार्य को गुरु-दक्षिणा में दिया गया था। लोग यहां आते हैं और यहां के इतिहास और पौराणिक मान्यताओं को लोगों को जुबानी सुनते हैं।

हालांकि, इस स्थान को रखरखाव और सहेजे जाने की जरूरत है और विकास आर्या इस दर्द को लिखते हैं कि लोककथाओं से सराबोर यह स्थान आज गोदामों, व्यावसायिक गलियों और निरंतर निर्माण की धूल से घिरा हुआ है।
इस बारे में 'गुड़गांव प्राम द मायथिक विलेज टू मिलेनियम सिटी' में वीणा तलवार ओल्डनबर्ग ने लिखा है कि खांडसा गांव एकलव्य का मंदिर उसी स्थान पर बनाया गया था जहां उनके कटे हुए अंगूठे को दफनाया गया था।
यह मंदिर बहुत लोकप्रिय था लेकिन विकास की रोशनी में इसकी चमक फीकी पड़ गई। यहां एक कुंड भी है जो विशेष महत्व रखता है। भीम कुंड जिसे भीम का तालाब भी कहा जाता है। यह शहर के पुराने धार्मिक-ऐतिहासिक भूगोल का हिस्सा है। स्थानीय परंपरा के अनुसार यह वह स्थान है जहां गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को शिक्षा देने के बाद स्नान किया करते थे।

एकमात्र हेरिटेज स्टीम लोको शेड
भाप इंजन याद हैं, छुकछुक करती रेलगाड़ी, दूर से धुआं छोड़ती, अपनी गति को लगातार कम करती, स्टेशन पर रुकती है और फिर लोगों की गहमागहमी...किसी अतीत के झरोखे से आई याद की मानिंद लगता है न, अगर नहीं भी देखी है तो निश्चित रूप से पुराने दौर की फिल्मों के दृश्य जरूर आपके जेहन में तैर गए होंगे। इन्हीं दृश्यों को जीवंत करना है तो दिल्ली से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर रेवाड़ी जिलों में अपनी यादों को ताजा कर सकते हैं।
एकमात्र हेरिटेज स्टीम लोको शेड में जहां 19वीं और 20वीं सदी के सबसे पुराने और ऐतिहासिक भाप इंजन सहेजे गए हैं। सबसे बड़ा आकर्षण है 1855 में यूनाइटेड किंगडम में बनी फेयरी क्वीन जो ईस्ट इंडिया कंपनी यहां लेकर आई थी। इसका नाम इसकी द्रुत गति और 130 हार्स पावर के इंजन और इसकी बेमिसाल खूबसूरती के लिए इसे दिया गया।
26 टन वजन और 40 किलोमीटर प्रति घंटा की गति वाले इस इंजन को 1998 में इसे दुनिया के सबसे पुराने चालू हालत के भाप इंजन के रूप में गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड मिला। कभी यह ट्रेन दिल्ली और अलवर के बीच फेयरी क्वीन स्पेशल के नाम से चलती थी। बहुत कुछ है यहां जानने के लिए।
इसके अनूठेपन और इतिहास के आकर्षण से फिल्में भी अछूती नहीं रही हैं। साल 2000 में बनी ‘गदर एक प्रेम कथा’ से 'गैंग्स आफ वासेपुर', 'इमरजेंसी' और वेब सीरीज 'फ्रीडम एट मिडनाइट' तक में ट्रेन सीक्वेंस भी रेवाड़ी शेड व गोकुलगढ़ स्टेशन पर शूट किए गए।
इसके अलावा इम्तियाज अली, दिलजीत दोसांझ और नसीरुद्दीन शाह के नए प्रोजेक्ट्स के लिए भी यहां के ऐतिहासिक इंजनों का बखूबी इस्तेमाल किया गया है। यानी आपने इसके ऐतिहासिक दृश्यों को फिल्मों में तो देखा, पर कभी पर्यटन की दृष्टि से नहीं।

संघर्ष का केंद्र बना था घासेड़ा किला
नूंह जिले का घासेड़ा किला 18वीं शताब्दी के उस उथल-पुथल भरे दौर की कहानी अपने खंडहरों में समेटे है जब मुगल सत्ता कमजोर पड़ रही थी और दिल्ली के आसपास क्षेत्रीय शक्तियां तेजी से उभर रही थीं। घासेड़ा का संबंध बड़गुजर राजपूत सरदार राव बहादुर सिंह से मिलता है जो मेवात के इस इलाके में प्रभावशाली शक्ति बन चुके थे।
सन् 1753 में भरतपुर के जाट शासक महाराजा सूरजमल ने घासेड़ा पर चढ़ाई की और लंबे संघर्ष के बाद 23 अप्रैल को किले पर कब्जा कर लिया। गुरुग्राम जिला गैजेटीयर के अनुसार बहादुर सिंह ने अपने लगभग 25 साथियों के साथ अंतिम लड़ाई लड़ी और मारे गए।
बाद के घटनाक्रम में उनके पुत्र फतह सिंह को कुछ समय के लिए अपने पिता का किला वापस मिला लेकिन 1755 में सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह ने फिर घासेड़ा पर अधिकार कर लिया। आज बचे हुए किले के अवशेष हैं जिन्हें इतिहास प्रेमी देखने के लिए पहुंचते हैं। इन अवशेषों से पता चलता है कि इसकी दीवारें कितनी मजबूत रही होंगी। हरियाणा सरकार ने इसके ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे राज्य संरक्षित स्मारकों में शामिल किया है।

अनंगपाल का दुर्ग
अगर पर्यटन और इतिहास का खूबसूरत संगम देखना हो तो दिल्ली से थोड़ा हटकर गुरुग्राम फरीदाबाद का रुख करना चाहिए जहां से आठवीं शताब्दी का इतिहास गुनगुनाता है। राजा अनंगपाल तोमर का जिक्र तो हम सुनते आए हैं लेकिन अगर उस दौर के पराक्रम की कहानी सुननी हो तो फरीदाबाद की ओर जाना होगा। ये सूरजकुंड क्षेत्र में है। वहां पर उन्होंने सिंचाई के लिए बांध बनाया था।
यह बांध उस समय के सिंचाई के क्षेत्र में भारतीय इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना मिलता है। वहां आज भी अनंगपुर गांव है जोकि राष्ट्रीय स्मारक है। परंपरा से संपूर्ण क्षेत्र के लोग अपने आप को अनंगपाल के वंशज मानते हैं।
इलाके में सूरजकुंड बांध अनंगपुर गांव से लगभग एक किलोमीटर उत्तर में स्थित है। 'दिल्ली- अ थाउजेंड ईयर्स आफ बिल्डिंग' में इतिहासकार लूसी पेक लिखती हैं कि आधुनिकता के जाल ने इतिहास को ढक लिया है।
इलाके में आधुनिक बसावट और निर्माण से अतिक्रमण हो चुका है लेकिन पहले अनंगपुर से यहां पहुंचना आसान था। बांध पास-पास स्थित दो पहाड़ियों के बीच की खाई पर बना हुआ है। इसकी चौड़ाई 50 मीटर और ऊंचाई सात मीटर है तथा इसे अच्छी तरह तराशे गए क्वार्टजाइट पत्थरों के खंडों से बनाया गया है।
अंदर की ओर बांध में सीढ़ियां बनी हैं। बांध से होकर बहने वाली धारा सूरजकुंड की झील को पानी देती है। पास में एक गोलाकार टैंक है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे एक अन्य तोमर राजा सूरज पाल ने बनवाया था।
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राजा नाहर सिंह पैलेस : बल्लभगढ़ की रियासत की कहानी
फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में स्थित राजा नाहर सिंह पैलेस राष्ट्रीय राजधानी की उन विरासतों में है जहां स्थानीय राजसत्ता की कहानी दिखाई देती है। हरियाणा पर्यटन के रिकार्ड में यह प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में दर्ज है।
इसके निर्माण की शुरुआत 18वीं सदी में बल्लभगढ़ के शासक परिवार के दौर में हुई और बाद के दशकों में इसका विस्तार होता रहा। लाल बलुआ पत्थर, मेहराब, छतरियां और राजपूत-मुगल स्थापत्य प्रभाव इसे केवल राजमहल नहीं रहने देते।
यह उस समय की क्षेत्रीय रियासतों और उनकी वास्तु संस्कृति की यादगार बन जाता है। हरियाणा पर्यटन की वर्तमान सूची में राजा नाहर सिंह पैलेस को बाकायदा पर्यटन परिसर के रूप में दर्ज किया गया है।

पंचवटी मंदिर : पांडवों की स्मृति से जुड़ा स्थल
पलवल की पंचवटी उन जगहों में है जहां धार्मिक आस्था और महाभारत की लोकपरंपरा एक-दूसरे से जुड़ती है। पंचवटी मंदिर का नाम पांडवों से जोड़ा गया है। स्थानीय मान्यता है कि वनवास के दौरान पांडव यहां कुछ समय के लिए ठहरे थे और बाद में यहां मंदिर का निर्माण हुआ। पर्यटन की दृष्टि से यही लोकस्मृति इस जगह को महत्व देती है।
इसके अलावा होडल के बुलवाना क्षेत्र का अंजनी कुंड भी पलवल जिले की आधिकारिक पर्यटन सूची में शामिल है। जिला प्रशासन के अनुसार स्थानीय परंपरा इसे कृष्ण और हनुमान से जुड़ी कथा से जोड़ती है। मान्यता है कि कृष्ण के रास के दौरान गायब होने पर गोपियां इस क्षेत्र में उन्हें खोजने आई थीं।
एक अन्य स्थानीय कथा में यशोदा के यहां आने और कृष्ण के हनुमान के रूप में प्रकट होने की बात कही जाती है। मंगलवार और शनिवार को यहां स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह स्थल ब्रज की धार्मिक यात्रा के भूगोल से भी जुड़ता है। इसलिए अंजनी कुंड को पलवल-होडल क्षेत्र में फैली ब्रज धार्मिक परंपरा की एक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।

विज्ञान, रहस्य और इतिहास की गलियों की सैर करवाता लौह स्तंभ
कुतुबमीनार परिसर में एक अजूबा है। वह है लौह स्तंभ। अजूबा क्यों, क्योंकि अगर किसी भी लोहे की वस्तु को यदि हम खुले में रख दें तो कुछ ही दिनों में उसमें जंग लग जाता है लेकिन 1600 साल से भी पुराने इस स्तंभ में आजतक इसपर कभी जंग नहीं लगा। माना जाता है कि इस लौह स्तंभ का निर्माण राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने कराया है।
कुछ इतिहासकार इसका निर्माण 912 ईसा पूर्व से मानते हैं। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक यह स्तंभ सम्राट अशोक का है, जो उन्होंने अपने दादा चंद्रगुप्त मौर्य की याद में बनवाया था। मान्यता यह भी है कि मथुरा में विष्णु पहाड़ी पर निर्मित भगवान विष्णु के मंदिर के सामने इसे खड़ा किया गया था और बाद में 1050 ईस्वी में दिल्ली के संस्थापक अनंगपाल इसे यहां लेकर आए थे।
सात मीटर ऊंचा यह स्तंभ छह हजार किलो से भी अधिक वजन का है। विज्ञान को आश्चर्य में डालने वाले इस अनूठे स्तंभ का वैज्ञानिक अध्ययन हुआ और रासायनिक परीक्षण से पता चला है कि इस स्तंभ का निर्माण गर्म लोहे के 20-30 किलो के कई टुकड़ों को जोड़ कर किया गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक स्तंभ को बनाते समय इसमें फास्फोरस की मात्रा अधिक मिलाई गई थी, इसीलिए इसमें आज तक जंग नहीं लगा।
अब सवाल यह भी उठते हैं कि फास्फोरस की खोज 1669 ईस्वी में हैम्बर्ग के व्यापारी हेनिंग ब्रांड ने की थी और स्तंभ का निर्माण उससे करीब 1200 साल पहले किया गया था। अगर इतिहास और विज्ञान की इन पेचीदगियों में उतरते हुए दिल्ली की सैर करनी है तो इस परिसर में जाना बेहतरीन यात्रा हो सकती है।
दिल्ली की ऐतिहासिक विरासत को संजोने की आवश्यकता
दिल्ली विजेताओं और स्वातंत्र्य समर के योद्धाओं की महान नगरी है जिसे महाराजा अनंगपाल तोमर ने ग्यारहवीं शताब्दी में बसाया था। यह कब्रों और दरगाहों को ओढ़े बर्बर आक्रमणकारियों की यादों में लिपटी राजधानी नहीं बल्कि पांडवों के समय की इंद्रप्रस्थ नगरी है। लेकिन इंद्रप्रस्थ की स्मृति फिर से जगानेवाला एक भी स्थान नहीं बनाया, क्यों? यहां देखने के लिए।
अक्षरधाम, 1500 वर्ष पुराना जंग रहित लोहे का अद्भुत विष्णु गरुड़ ध्वज स्तंभ जो महाराजा अनंगपाल तोमर द्वारा स्थापित किया गया था उसे माहात्म्य और स्वतंत्र प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।
औरंगजेब की इस्लामी मतांधता को चुनौती देने वाले महान सिख गुरु तेगबहादुर और उनके साथी भाई मति दास, भाई सती दास, भाई दयाला का बलिदान स्थल- गुरुद्वारा शीशगंज साहिब, मुगलों को हराने वाले बंदा वीर बैरागी का बलिदान स्थल महरौली, इजरायल को स्वतंत्रता दिलाने में सहायक भारतीय वीर सैनिकों की याद में बना तीन मूर्ति हाइफा चौक भाई बघेल सिंह, भाई जस्सा सिंह अहलुवालिया की स्मृति में एक पत्थर भी नहीं है, एक स्मृति स्तंभ की आवश्यकता है। दिल्ली में ही ऐसे कितने स्थल हैं जिन्हें संजोने की आवश्यकता है।
-तरुण विजय, पूर्व सांसद, पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण, भारत सरकार।
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