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किताबों के बहाने मिल रहे ‘अपने’, एनसीआर में तेजी से बढ़ रहा ऑफलाइन रीडिंग कल्चर

Published: Fri, 11 Sep 2026 07:22 PM (IST)

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में किताबों के बहाने लोग एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं, जिससे ऑफलाइन रीडिंग कल्चर तेजी से बढ़ ...और पढ़ें

ऑफलाइन रीडिंग कल्चर को स्थापित करने में ‘दिल्ली रीड्स’ का महत्वपूर्ण योगदान है। मोलिना सिंह और परिधि पुरी जैसे पाठकों ने इसे शुरू किया है।

ऑफलाइन रीडिंग कल्चर को स्थापित करने में ‘दिल्ली रीड्स’ का महत्वपूर्ण योगदान है। मोलिना सिंह और परिधि पुरी जैसे पाठकों ने इसे शुरू किया है।

HighLights

  1. एनसीआर में किताबों के माध्यम से सामाजिक जुड़ाव बढ़ रहा है।

  2. 'दिल्ली रीड्स' जैसे बुक क्लब हजारों लोगों को जोड़ रहे हैं।

  3. विभिन्न आयु वर्ग के लोग ऑफलाइन रीडिंग कल्चर से जुड़ रहे हैं।

प्रियंका दुबे मेहता, नई दिल्ली। किताबें हैं तो दोस्तों की आवश्यकता नहीं होती, किताबों के बारे में यह प्रचलित और एक तरह से स्थापित कहावत थी, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोग इसे एक दर्जा और ऊपर रखते हुए केवल अपने लिए ही नहीं औरों के लिए भी दोस्त बना रहे हैं। किताबें अब सामुदायिक मित्र साबित हो रही हैं। हाल ही में इंडिया बुक मार्केट की रिपोर्ट इसमें और उत्साह भरती है जो बताती है कि इस वर्ष पुस्तकों का बाजार 95 हजार करोड़ से अधिक का हुआ। डिजिटल का आंकड़ा उससे अलग है।

ऑफलाइन रीडिंग कल्चर को दे रहीं बढ़ावा

इन दिनों किताबें लोगों को जोड़ रही हैं, नए रिश्ते बना रही हैं, पुरानों रिश्तों को जीवंत कर रही हैं। जी हां, इन दिनों राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में किताबों का यही रूप सामने आ रहा है। आज तो सोशल मीडिया के दौर में एकाकी हुए जीवन में फिर से रंग भरती किताबें सही मायनों में एक सामाजिक रिश्तों का सेतु बन गई हैं जो इस आभासी दौर में दूर हुए द्वीपों के लोगों को ऑफलाइन रीडिंग कल्चर से जोड़ने का काम कर रही हैं। 

बैठक में करते हैं किताब पर चर्चा

शांत शीतल बगीचा या फिर खूबसूरत कैफे, हाथों में किताबें और चाय की चुस्कियां और बहुत से लोग जो एक ही रुचि साझा करते हों, ऐसे लगता है मानों एक ही धागे में पिरोए हुए साहित्यिक मोती हों जो एक दूसरे का साथ पाकर अपनी चमक बिखेरते हैं। ये खूबसूरत दृश्य इन ऑफलाइन बुक क्लब्स का होता है। पहले पुस्तक समूह का मतलब आम तौर पर एक किताब तय करना और अगली बैठक में उस पर चर्चा करना होता था।

हजारों की संख्या में जुड़ गए हैं लोग

अब इसके साथ एक दूसरी जरूरत भी जुड़ गई है साथ समय बिताना, हंसना, गाना, खाना पीना और किताबों को सराहना। ऑफलाइन रीडिंग कल्चर को स्थापित करने में ‘दिल्ली रीड्स’ का महत्वपूर्ण योगदान है। मोलिना सिंह और परिधि पुरी जैसे पाठकों ने इसे शुरू किया और हजारों की संख्या में लोग उनसे जुड़ गए।

इस तरह के समूहों ने लोगों को किताबों से जोड़ने के साथ साथ एक कम्युनिटी का निर्माण भी किया। लोग किताबों, देश-समाज के मुद्दों पर चर्चा के साथ-साथ अपने निजी जीवन की बातें भी साझा करने लगे और लोगों को इससे फायदा हुआ कि भागदौड़ की जिंदगी से निकलकर सुकून के कुछ पल मिलने लगे।

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हर महीने बैठक का करते हैं बेसब्री से इंतजार 

उम्र के जिस पड़ाव पर लोग सब कुछ छोड़ देते हैं, मोनिका सोलंकी ने उस उम्र में ऑफलाइन बुक क्लब बनाया है। युवा भी इस ग्रुप का हिस्सा हैं। दिल्ली के संस्कृति स्कूल में इंग्लिश लिटरेचर की शिक्षक के पद से रिटायर हुईं संगीता चौधरी का कहना है कि उन्हें बचपन से ही पढ़ने का खासा शौक था।

ऐसे में जब उन्हें मोनिका के ऑफलाइन बुक क्लब से जुड़ने का अवसर मिला तो उन्हें बहुत खुशी हुई। उनका कहना है कि किताबें पढ़ना, एक जैसे सोच रखने वाले लोगों से मिलना और चर्चा करना अपने आप में एक तरोताजा कर देने वाला अनुभव होता है। एक उत्साह होता है हर महीने इस बैठक में शामिल होने का।

30 साल से 85 वर्ष तक के सदस्य शामिल

बुक क्लब की संस्थापक मोनिका सोलंकी का कहना है कि आठ साल पहले एक ग्रुप शुरू किया था जिसमें 30 साल से 85 वर्ष के सदस्य हैं। जिस तरह से उन्हें किताबों से लगाव है, पढ़ना बहुत पसंद है, ऐसे और भी लोग हैं लेकिन समय और मंच के अभाव में पढ़ नहीं पाते, ऐसे में अगर ऐसे ही लोगों का एक समूह बनाया जाए सोश्यलाइज भी हुआ जा सकता है और किताबों से लगातार लोगों को जोड़े भी रखा जा सकता है।

कभी कैफे तो कभी पार्क में खुलती हैं किताबें

दिल्ली के अलावा गुरुग्राम में गुरुग्राम रीड्स और बुक क्लब एनसीआर जैसे समूहों से हजारों की संख्या में लोग जुड़े हुए हैं। पेशे से शिक्षक रुचिका ठुकराल का कहना है कि अकेला बैठकर किताबें पढ़ना और लोगों के बीच बैठकर काफी की सिप के साथ किताबों से जुड़ना और बुक रीडर्स के बारे में जानना अपने आप में अनूठा और रिफ्रेशिंग अनुभव होता है।

गुरुग्राम में बुक रीडिंग समूहों के आयोजन हफ्ते से लेकर मासिक तक होते हैं, कभी अनूठे कैमरा म्यूजियम तो कभी ताऊ देवीलाल पार्क की हरियाली के बीच या फिर आधुनिकता की चमक बिखेरते गैलेरिया मार्केट के किसी कैफे में होते हैं। हर बार एक विविधता लिए आयोजनों से लोग इस कदर प्रभावित हैं कि इनके सदस्यों की संख्या बढ़ती जा रही है।

अनजान शहर में पूरे हुए 'अपनों' की तलाश

मूलरूप से कानपुर की निवासी दिव्या खरे बताती हैं कि जब वे गुरुग्राम आईं तो अनजान शहर और अजनबी लोगों के बीच अपनों को तलाशने के लिए एक बुक क्लब का हिस्सा बनीं। अब उन्हें शहर अजनबी बिल्कुल भी नहीं लगता। इंस्टाग्राम पेज 'ठहराव' के जरिये वे लोगों को ऐसे अनुभव दे रही हैं, जहां पठन-पाठन के साथ-साथ लोगों को सामाजिक जुड़ाव का अहसास देती हैं। उनका कहना है कि किसी अजनबी से बातचीत शुरू करने या यह सोचने की जरूरत नहीं पड़ती कि सामने वाले से क्या बात की जाए या दोनों में क्या समानता है।

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किताबों से उपजे सवालों की तलाश

दिव्या के मुताबिक, जब भी वह कोई किताब पूरी करती थीं, तो उनके मन में उससे जुड़ी बहुत सी बातें और विचार होते थे, जिन्हें वह किसी के साथ साझा करना चाहती थीं। वह अक्सर अपने दोस्तों से किताबों के बारे में बात करती थीं, लेकिन उनमें से बहुत से लोग नियमित रूप से किताबें नहीं पढ़ते। ऐसे में वे हमेशा यह समझ नहीं पाते थे कि किसी किताब, उसके किसी किरदार या उसके अंत ने उन्हें इतना प्रभावित क्यों किया।

'इस समूह ने अपनों की तलाश पूरी की'

वह ऐसे लोगों के बीच रहना चाहती थीं, जिन्हें किताबों में उनकी तरह दिलचस्पी हो और जिनके साथ वह पढ़ी हुई किताब पर खुलकर बातचीत कर सकें, किरदारों या कहानी के अंत को लेकर असहमत हो सकें और किसी अच्छी किताब को खोजने का उत्साह साझा कर सकें।

गुजरात से आए आइटी कंपनीकर्मी सौमिल शाह का कहना है कि आपको किसी राज्य विशेष या धर्म विशेष के समुदायों से जुड़ने का मंच केवल संस्कृति से जोड़ता है लेकिन किताबों का ऑफलाइन मंच आपको हर संस्कृति, हर पृष्ठभूमि, हर आयु और आयवर्ग के लोगों से जोड़ता है। इन समूहों से जुड़कर उनकी अपनों की तलाश पूरी हुई है।

सोसायटी, जो समेट रही है साहित्य के मोती

गुरुग्राम के निर्णावा कंट्री निवासी पीयू लाहिरी बताती हैं कि उनकी सोसायटी में सिविक कामंस नाम से एक समूह है जो लोगों को एक साथ आकर पठन-पाठन का अनुभव देता है। यहां मासिक आयोजन होते हैं और लेखक और पाठक आकर किताबों, साहित्य, समाज और संस्कृति पर चर्चा करते हैं।

हाल ही में लेखक में मनु जोसेफ ने यहां आकर अपनी किताब 'व्हाई द पूअर डोंट किल अस' पर चर्चा हुई। पीयू के मुताबिक इस आयोजन का उद्देश्य यह है कि लोग कुछ ऐसा करें जो अर्थपूर्ण हो। जहां हर क्षेत्र के लोग आपस में मिलें, सामाजिक संरचना को मजबूती दें। इसमें केवल सोसायटी ही नहीं, अन्य पाठक भी हिस्सा लेते हैं और भागते वक्त में कुछ पल ठहरते हैं।

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यहां तैयार होती है नन्हें पाठकों की पौध

किताबें पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती। कम उम्र से ही अगर बच्चों में पढ़ने की आदत डाली जाए तो वह उनकी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। इसी सोच के साथ प्योर हार्ट्स संस्था के बैनर तले शालू साहनी और उनके साथी नन्हें मुन्नों को किताबों से जोड़ रहे हैं।

शालू के मुताबिक सामान्य लोगों को तो स्कूलों में किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है लेकिन जो लोग सामान्य पढ़ाई का खर्च भी वहन नहीं कर सकते उन्हें किताबों से जोड़ा जाना जरूरी है क्योंकि व्यक्तित्व विकास में, विचारों को समृद्ध करने में किताबों का योगदान होता है।

अगर वंचित वर्ग के बच्चों को इससे जोड़ा जाए तो बेहतर नागरिक बनेंगे, इसी सोच के साथ वे बस्तियों में जातें हैं और गुरुकुल के बैनर तले इन बच्चों के लिए रीडिंग सेसंश करते हैं।