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क्या कन्हैया-जाखड़ ने डुबोई लुटिया? DUSU चुनाव में 11 साल बाद NSUI जीरो पर आउट; दीपांशु फैक्टर पड़ा भारी  

Published: Mon, 21 Sep 2026 08:46 AM (IST)

डूसू चुनाव में 11 साल बाद एनएसयूआई की करारी हार के बाद संगठन का शीर्ष नेतृत्व और उसकी रणनीति सवालों ...और पढ़ें

कन्हैया कुमार और विनोद जाखड़। फोटो: इंटरनेट

कन्हैया कुमार और विनोद जाखड़। फोटो: इंटरनेट

HighLights

  1. एनएसयूआई को डूसू चुनाव में 11 साल बाद करारी हार मिली

  2. टिकट वितरण में गड़बड़ी और आंतरिक खींचतान हार का मुख्य कारण

  3. बागी दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत

लोकेश शर्मा, नई दिल्ली। डूसू चुनाव के बीच सत्य निकेतन हादसे से जिस तरह निजी पीजी में रहने वाले हजारों छात्रों की सुरक्षा और छात्रावास बड़ा चुनावी मुद्दा बना।

इसी तरह, कुछ और मुद्दे भी थे, जिससे NSUI के पक्ष में माहौल होने के अनुमान लगाए जा रहे थे। लेकिन परिणाम बताते हैं कि वह मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने, छात्रों को समझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है।

इसके साथ संगठन की पूरी रणनीति टिकट वितरण और उम्मीदवारों के चयन में टकराहट को सुलटाने में ही लगी रही। नतीजतन, बेहतर माहौल के बावजूद 11 वर्ष बाद NSUI का डूसू से सूपड़ा ही साफ हो गया है।

दीपांशु की बगावत पड़ी भारी

इस करारी हार से संगठन का शीर्ष नेतृत्व और उनकी रणनीति कठघरे में है। क्योंकि, टिकट कटने से निर्दलीय मैदान में उतरें उसके कार्यकर्ता दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर उसे पटखनी दी।

राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इस करारी हार की बड़ी वजह टिकट बंटवारे को लेकर संगठन के भीतर खींचतान रही, जिसने स्थिति और जटिल कर दी। सबसे बड़ा झटका दीपांशु शौकीन की बगावत से लगा।

उन्होंने 30,615 वोट लेकर उपाध्यक्ष पद जीत लिया। एबीवीपी के ईशु मौर्या को 13,705 वोट से हराया, जबकि NSUI के वीर चतरथ को 4313 वोट ही मिले।

यानी जिस चेहरे को संगठन अपने साथ नहीं रख सका, वही उसके आधिकारिक उम्मीदवार से कई गुना अधिक वोट लेकर जीत गया।

टिकट चयन पर उठे सवाल

टिकट वितरण में NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ और प्रभारी कन्हैया कुमार की भूमिका को लेकर संगठन के भीतर सवाल उठ रहे हैं। संगठन के लोग दीपांशु को टिकट नहीं देने के निर्णय में कन्हैया कुमार का नाम लेते हैं।

हालांकि, कन्हैया कुमार के करीबी कहते हैं कि दीपांशु को अध्यक्ष पद की पेशकश की गई थी। लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसी मतभेद के कारण उनका टिकट कटा।

यह भी कहा गया कि नामांकन वापसी के दिन दीपांशु ने संगठन से चर्चा किए बिना अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद से अपना नाम वापस ले लिया था और केवल उपाध्यक्ष पद पर मैदान में रहे। इससे संगठन में नाराजगी थी।

विशेष यादव भी बने चुनौती

राजस्थान से जुड़े उम्मीदवारों को तरजीह दिए जाने की चर्चा ने भी संगठन के भीतर असंतोष बढ़ाया। अध्यक्ष पद पर विजय शंकर मीणा और संयुक्त सचिव पद पर लड़े गोपाल चौधरी राजस्थान से हैं।

संयुक्त सचिव पद पर विशेष यादव को टिकट दिए जाने की भी चर्चा थी। टिकट नहीं मिला तो उन्होंने निर्दलीय दांव ठोक दी और 15,778 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे, जबकि संगठन प्रत्याशी गोपाल चौधरी को 15,206 वोट मिले।

महज 572 वोट का अंतर टिकट चयन के फैसले पर सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त रहा।

नोटा से भी कम वोट मिले

आइसा-एएसएफआई गठबंधन व एएसएपी को नोटा से भी कम वोट वामपंथी संगठनों आइसा-एएसएफआई गठबंधन को चारों पदों पर कुल 22,331 और आप के छात्र विंग एएसएपी को 11301 वोट मिले।

वहीं नोटा को कुल 23942 वोट मिले। दोनों ही संगठन को नोटा से भी कम वोट मिले। आइसा-एएसएफआई गठबंधन से अध्यक्ष पद पर अनन्या रतूड़ी को 5377, उपाध्यक्ष पर अक्षत शिखर को 2383, सचिव पर स्टैनजिन डेसक्यान्ग को 8734 और संयुक्त सचिव पर बी परिजात को 5837 वोट मिले।

छात्र संगठन एएसएपी के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी असमित को 1388 वोट मिले जबकि सचिव पद पर उम्मीदवार पंकज कुमार को कुल 7639 वोट ले गए। लेकिन ये काफी कम रहा।

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