दिल्ली-एनसीआर में वसूले गए 140 करोड़ का ईपीसी, प्रदूषण कम होने का वैज्ञानिक डेटा नहीं
दिल्ली-एनसीआर में डीजल वाहनों से वसूले गए 140 करोड़ रुपये के पर्यावरण संरक्षण शुल्क (ईपीसी) के बावजूद, हवा की गुणवत्ता में सुधार का कोई वैज्ञानिक डेटा उपलब्ध नहीं है।
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वाहन मालिकों से करीब 140 करोड़ रुपये वसूले गए। फाइल फोटो
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण से जंग के लिए डीजल वाहनों से वसूले जाने वाले ''पर्यावरण संरक्षण शुल्क'' (ईपीसी) का व्यय भी गंभीरता से नहीं किया जा रहा है। एक नई आरटीआइ से सामने आया है कि पिछले 21 महीनों में वाहन मालिकों से करीब 140 करोड़ रुपये वसूले गए हैं, लेकिन इस भारी खर्च के बावजूद जमीन पर हवा की गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ है, इसका कोई स्पष्ट वैज्ञानिक डेटा उपलब्ध नहीं है।
महीनों में 51,000 से अधिक वाहनों पर लगा 'जुर्माना'
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 और 2025-26 (31 दिसंबर 2025 तक) के दौरान 51,913 डीजल वाहनों से कुल 140.64 करोड़ रुपये ईपीसी के रूप में एकत्र किए गए। यह शुल्क उन डीजल वाहनों पर लगाया जाता है जिनकी इंजन क्षमता 2000 सीसी या उससे अधिक है। गणना की जाए तो औसतन हर वाहन मालिक ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए लगभग 27,000 रुपये का योगदान दिया है।
कहां खर्च हुआ पैसा?
हैरानी की बात यह है कि एकत्र की गई राशि में से लगभग 90 प्रतिशत यानी 128.76 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसका विवरण इस प्रकार है:-
- स्वच्छ वायु कार्ययोजना : एनसीआर के 19 शहरों में स्वच्छ हवा की कार्ययोजना के लिए 62.99 करोड़ रुपये का अनुदान दिया गया।
- अनुसंधान और अध्ययन : आइआइटी कानपुर को उत्सर्जन मानकों के अध्ययन के लिए 69.84 लाख और एआरएआइ को उत्सर्जन सूची तैयार करने के लिए 5.65 करोड़ रुपये दिए गए।
- तकनीकी उपकरण : बीटा रे एटेनुएशन एनालाइजर्स और जनरेटर सेटों की रेट्रोफिटिंग पर भी लाखों रुपये खर्च हुए।
पारदर्शिता पर उठते सवाल
सरकारी खजाने में पैसा आ रहा है और खर्च भी हो रहा है, लेकिन बुनियादी सवाल जस का तस बना हुआ है। आरटीआइ के जवाब में सीपीसीबी ने ऐसा कोई ठोस डेटा पेश नहीं किया है जो यह साबित करे कि इस 140 करोड़ के खर्च से पीएम 2.5 या पीएम 10 के स्तर में कितनी कमी आई है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर केवल टैक्स वसूली और कागजी अध्ययनों से समाधान नहीं निकलेगा। जब तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया जाएगा कि इन करोड़ों रुपयों ने दिल्ली और एनसीआर की हवा को कितना शुद्ध बनाया है, तब तक सवाल उठते रहेंगे।
