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बाघ, भेड़िये और सांप... दिल्ली के चिड़ियाघर में पटना से आए नए मेहमान, जल्द दीदार कर सकेंगे पर्यटक

Published: Sun, 19 Apr 2026 06:41 PM (IST)Updated: Sun, 19 Apr 2026 06:47 PM (IST)

दिल्ली और पटना चिड़ियाघर के बीच वन्यजीव विनिमय कार्यक्रम ने गति पकड़ी है। 11 अप्रैल को पटना से दिल्ली में ...और पढ़ें

दिल्ली और पटना चिड़ियाघर के बीच वन्यजीव विनिमय कार्यक्रम ने गति पकड़ी है। इमेज एआई

दिल्ली और पटना चिड़ियाघर के बीच वन्यजीव विनिमय कार्यक्रम ने गति पकड़ी है। इमेज एआई

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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली और पटना चिड़ियाघर के बीच चल रहे वन्यजीव एक्सचेंज प्रोग्राम ने गति पकड़ ली है। दोनों चिड़ियाघरों के बीच हुए इस समझौते के तहत दिल्ली के वन्यजीव प्रेमियों को नए जीवों को न केवल करीब से देखने का मौका मिलेगा, बल्कि यह पहल वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता की दृष्टि से भी एक मील का पत्थर साबित हो रही है।

इतने जानवर पटना से पहुंचे दिल्ली

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, 11 अप्रैल को पटना चिड़ियाघर से दुर्लभ वन्यजीवों का एक दल सुरक्षित तरीके से दिल्ली पहुंचा। उसमें भारतीय ग्रे भेड़िये के दो नर व दो मादा, एक बाघ, चार घड़ियाल, दो धामन सांप और दो कॉमन बार्न आउल शामिल थे। उन नए मेहमानों को फिलहाल क्वारंटाइन में रखा गया है, जहां विशेषज्ञों और पशु चिकित्सकों की टीम 24 घंटे उनके स्वास्थ्य और व्यवहार पर नजर रखे हुए है।

प्रशासन का कहना है कि स्वास्थ्य परीक्षणों के बाद ही उन्हें जल्द ही आम दर्शकों के लिए बाड़ों में छोड़ा जाएगा, जिससे चिड़ियाघर की रौनक और बढ़ जाएगी।

वहीं, इस एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत दिल्ली चिड़ियाघर से भी दुर्लभ प्रजातियों के जीवों को 14 अप्रैल को पटना के लिए रवाना किया गया, जो वहां पहुंच गए।

इस खेप में दो नर और चार मादा संगाई हिरण, एक मादा सफेद बाघ, चार पेंटेड स्टार्क, चार ग्रेट व्हाइट पेलिकन और एक दुर्लभ ल्यूसी स्टिक काला मृग शामिल हैं। इन सभी वन्यजीवों को भेजने के दौरान अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का खास ध्यान रखा गया है, ताकि लंबी यात्रा का उन पर कोई बुरा असर न पड़े।

इस बारे में दिल्ली चिड़ियाघर के निदेशक संजीत कुमार ने कहा कि यह तालमेल सिर्फ जानवरों का आदान- प्रदान नहीं है, बल्कि यह जैव विविधता को सहेजने और वन्यजीवों के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में उठाया गया एक दूरदर्शी कदम है। इससे न केवल दुर्लभ प्रजातियों का सुरक्षित प्रजनन सुनिश्चित होगा, बल्कि आनुवंशिक विविधता भी बनी रहेगी।

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