मुखर्जी नगर से हौज खास तक 'अर्बन विलेज' या आग का कुआं? दिल्ली में कोचिंग, पीजी और कैफे का डराने वाला सच
दिल्ली के अर्बन विलेज जैसे हौज खास और मजनू का टीला, जो अब कैफे और हॉस्टल के केंद्र बन गए ...और पढ़ें

दिल्ली में 2016 से 2026 के बीच 800 लोगाें की मौत हाे चुकी है। फोटो: एआई जनरेटेड
HighLights
संकरी गलियां और पुराने ढांचे बढ़ा रहे आग का जोखिम
व्यावसायिक उपयोग से सुरक्षा मानकों की अनदेखी हो रही
नियमित ऑडिट और सख्त नियम ही एकमात्र समाधान
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली की पहचान सिर्फ लाल किला, कुतुब मीनार, इंडिया गेट या संसद भवन नहीं है। इसकी असली धड़कन उन बाजारों और अर्बन विलेज में बसती है, जहां दिनभर चहल-पहल रहती है और शाम ढलते ही कैफे, रेस्तरां, पब और रंग-बिरंगी रोशनियों से पूरा इलाका जीवंत हो उठता है।
हौज खास विलेज, मजनू का टीला, हुमायूंपुर, शाहपुर जाट और मुखर्जी नगर जैसे इलाके युवाओं की पहली पसंद हैं, लेकिन इन्हीं चमकती गलियों के पीछे एक ऐसा खतरा छिपा है, जिसे अधिकांश लोग नजरअंदाज कर देते हैं।
संकरी गलियां, एक-दूसरे से सटी बहुमंजिला इमारतें, नीचे कैफे-रेस्तरां और ऊपर पीजी, हॉस्टल, बार, बुटीक और कोचिंग सेंटर। ऊपर-नीचे जाने के लिए सिर्फ एक सीढ़ी, बिजली के तारों का मकड़जाल, अतिक्रमण और हर वक्त उमड़ती भीड़... किसी भी आग की घटना को बड़े हादसे में बदलने के लिए इतना ही काफी है।

सवाल सिर्फ यह नहीं कि यहां आग लग सकती है, बल्कि यह है कि अगर आग लग गई, तो हजारों लोगों के बाहर निकलने का रास्ता कहां होगा?
आंकड़े भी इसी खतरे की गवाही देते हैं। दिल्ली में 2019 से अब तक आग की घटनाओं में 543 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं 2016 से 2026 के बीच यह आंकड़ा 800 के पार पहुंच गया।
सिर्फ 2026 के पहले छह महीनों में ही 65 लोगों ने आग की घटनाओं में जान गंवाई। यानी हादसे रुक नहीं रहे, बल्कि लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते व्यवस्था नहीं बदली गई, तो अगली त्रासदी केवल समय का सवाल हो सकती है।

कैसे बदले गांव से कमर्शियल हब तक?
दिल्ली के कई गांव कभी पूरी तरह रिहायशी इलाके थे। यहां स्थानीय आबादी रहती थी और गलियां उसी हिसाब से बनाई गई थीं। समय के साथ शहर का विस्तार हुआ, मेट्रो नेटवर्क बढ़ा और आसपास कॉरपोरेट ऑफिस, विश्वविद्यालय और पर्यटन केंद्र विकसित हुए।
इसका असर यह हुआ कि मकानों को धीरे-धीरे हॉस्टल, पीजी, कैफे, रेस्टोरेंट और गेस्ट हाउस में बदला जाने लगा। जहां पहले एक परिवार रहता था, वहीं अब दर्जनों लोग ठहरते हैं या रोजाना सैकड़ों ग्राहक आते-जाते हैं।

बुनियादी ढांचा वहीं, भीड़ कई गुना
समस्या की शुरुआत यहीं से होती है। जिन गलियों को कुछ घरों के लिए बनाया गया था, आज उन्हीं रास्तों से ग्राहकों, डिलीवरी वाहनों, दोपहिया वाहनों और आपातकालीन सेवाओं को गुजरना पड़ता है।
अधिकांश अर्बन विलेज में सड़कें इतनी संकरी हैं कि दो कारों का आमने-सामने निकलना भी मुश्किल हो जाता है। कई जगह पार्किंग और अतिक्रमण के कारण रास्ता और संकरा हो जाता है। ऐसे में यदि आग जैसी आपदा आती है तो दमकल वाहनों के लिए घटनास्थल तक पहुंचना बड़ी चुनौती बन जाता है।

पुराने मकान, नया इस्तेमाल
विशेषज्ञों का मानना है कि इन इलाकों की बड़ी संख्या में इमारतें मूल रूप से आवासीय उपयोग के लिए बनाई गई थीं। बाद में इनमें अतिरिक्त कमरे, ऊपरी मंजिलें, रूफटॉप कैफे, बेसमेंट और अन्य व्यावसायिक हिस्से जोड़ दिए गए।
यदि किसी इमारत की संरचना, बिजली व्यवस्था और अग्नि सुरक्षा प्रणाली को नए उपयोग के अनुरूप नहीं बदला गया हो, तो जोखिम कई गुना बढ़ सकता है।

आग लगने पर क्यों बढ़ जाता है खतरा?
अग्निशमन विशेषज्ञ बताते हैं कि आग लगने के बाद सबसे महत्वपूर्ण होता है लोगों का सुरक्षित बाहर निकलना और दमकल की त्वरित पहुंच, लेकिन कई घनी बस्तियों में ये दोनों ही काम मुश्किल हो जाते हैं।
- संकरी गलियां।
- आपस में सटी इमारतें।
- सीमित निकासी मार्ग।
- ऊपरी मंजिलों तक पहुंचने में कठिनाई।
- बिजली के तारों का जाल।
- अवैध पार्किंग।
ये सभी परिस्थितियां राहत और बचाव कार्य को प्रभावित कर सकती हैं।
पर्यटन और कारोबार ने बदली तस्वीर
दिल्ली के कई अर्बन विलेज आज शहर की नाइटलाइफ और फूड कल्चर का अहम हिस्सा बन चुके हैं। यहां देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। छात्रों और नौकरीपेशा युवाओं के लिए ये इलाके अपेक्षाकृत सस्ती रहने की सुविधा भी उपलब्ध कराते हैं। यानी आर्थिक गतिविधि लगातार बढ़ी, लेकिन कई स्थानों पर उसी अनुपात में आधारभूत ढांचे का विकास नहीं हो पाया।

केवल एक इलाके की समस्या नहीं
शहरी नियोजन विशेषज्ञों का कहना है कि यह चुनौती किसी एक मोहल्ले तक सीमित नहीं है। राजधानी के कई पुराने रिहायशी क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं।
यदि किसी इलाके में आबादी, भवनों का उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियां बदल रही हैं, तो वहां अग्नि सुरक्षा, भवन मानकों, पार्किंग, बिजली व्यवस्था और आपदा प्रबंधन की भी नियमित समीक्षा आवश्यक है।

समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञ कई उपाय सुझाते हैं-
- व्यावसायिक उपयोग वाली इमारतों का नियमित सुरक्षा ऑडिट।
- अग्नि सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन।
- संकरी गलियों में आपातकालीन पहुंच सुनिश्चित करने की योजना।
- बिजली व्यवस्था का समय-समय पर निरीक्षण।
- भवनों में पर्याप्त निकासी मार्ग और अग्निशमन उपकरण।
- स्थानीय व्यापारियों और निवासियों को अग्नि सुरक्षा प्रशिक्षण।
संतुलन सबसे बड़ी चुनौती
दिल्ली के अर्बन विलेज शहर की अर्थव्यवस्था, पर्यटन और युवाओं की जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। इन्हें बंद करना समाधान नहीं है। असली चुनौती यह है कि इन इलाकों की लोकप्रियता और व्यावसायिक विकास के साथ सुरक्षा मानकों को भी समान गति से मजबूत किया जाए।
हर बड़े अग्निकांड के बाद कुछ समय के लिए सुरक्षा व्यवस्था चर्चा में आती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी समाधान तभी संभव है जब शहरी विकास और सुरक्षा योजना साथ-साथ आगे बढ़ें। तभी दिल्ली के ये लोकप्रिय इलाके न केवल जीवंत रहेंगे, बल्कि लोगों के लिए अधिक सुरक्षित भी बन सकेंगे।
दिल्ली की व्यावसायिक इकाइयों का चरणबद्ध फायर ऑडिट कराया जाएगा। अग्निशमन सेवा के आधुनिकीकरण के तहत दो नई ब्रोंटो मशीनें, 100 क्विक रिस्पांस व्हीकल और आठ नए फायर स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई अब नियमित और सख्ती से जारी रहेगी।
- आशीष सूद, दिल्ली के गृह एवं ऊर्जा मंत्री
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