बारिश नहीं अधूरी तैयारी डुबोती है शहर, एक्सपर्ट ने बताई दिल्ली में जलभराव की असली वजह
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स के पूर्व निदेशक हितेश वैद्य ने बताया कि शहरों में जलभराव का कारण बारिश नहीं, बल्कि अधूरी तैयारियां और खराब अर्बन गवर्नेंस है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स के पूर्व निदेशक हितेश वैद्य बताते हैं कि ये वर्षा कभी संकट लेकर नहीं आती है। बल्कि यह अधूरी तैयारियों की पोल खोलती है।
HighLights
शहरों में जलभराव बारिश नहीं, अधूरी तैयारियों का परिणाम है।
स्थानीय निकायों को वित्तीय और निर्णय लेने की शक्ति दें।
ड्रेनेज सफाई को वार्षिक उत्सव नहीं, सतत प्रक्रिया बनाएं।
स्वदेश कुमार, नई दिल्ली। देश की जीडीपी में 70 प्रतिशत योगदान शहरों का होता है लेकिन कई शहरों में खराब ड्रेनेज सिस्टम और वर्षा जल संचयन को लेकर उदासीनता हर बार उजागर होती है।
राजधानी दिल्ली सहित कई शहरों में हल्की वर्षा के बाद जगह-जगह जलभराव और सड़कों पर पानी यातायात का मार्ग अवरुद्ध कर देता है और दोष वर्षा पर लगा दिया जाता है।
मगर अर्बन गवर्नेंस के विशेषज्ञ और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स के पूर्व निदेशक हितेश वैद्य बताते हैं कि ये वर्षा कभी संकट लेकर नहीं आती है। बल्कि यह अधूरी तैयारियों की पोल खोलती है।
विभागों के बीच आपसी खींचतान
'जागरण विमर्श' कार्यक्रम में हितेश वैद्य ने कहा कि शहरों में नाले कोई और विभाग बना रहा है और सीवर की जिम्मेदारी किसी और के पास है।
दिल्ली में तो नालों की जिम्मेदारी भी कई विभागों के पास है। विभागों के बीच आपसी खींचतान में हर साल खामियां सामने आ जाती हैं।
अभी स्थिति यह है कि नीति केंद्र सरकार के स्तर पर तैयार होती है। उस पर अमल राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को करना होता है। जबकि ये क्रम उल्टा होना चाहिए।
नीति स्थानीय निकाय समस्या को देखते हुए बनाए। इसी अनुरूप फंड और संसाधन उसे उपलब्ध कराया जाए। तभी कोई हल निकल सकता है।
फाइलों में दबकर रह गया
हितेश वैद्य के अनुसार, कभी भी शहर वर्षा से नहीं, ये डूबते तब हैं जब जिम्मेदार संस्थाएं सीखना बंद कर देती हैं। हर साल मानसून में शहरों का डूबना केवल ड्रेनेज की समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे संस्थागत और नीतिगत कारण छिपे हैं। आज जब हम एआइ और डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, तब भी नालों से गाद निकालने का काम मैनुअली किया जा रहा है। तकनीक का यह अभाव शर्मनाक है। मास्टर प्लान 2048 पर वर्ष 2018-19 से ही काम शुरू हो गया लेकिन आज भी यह फाइलों में दबकर रह गया।
फैसले लेने की आजादी नहीं मिलेगी
उन्होंने कहा कि योजनाएं केंद्रीय स्तर पर एसी कमरों में तैयार होती हैं और राज्यों द्वारा लागू की जाती हैं, जबकि समस्या पूरी तरह स्थानीय होती है। जब तक स्थानीय निकायों (नगर निगम/नगर पालिका) को वित्तीय शक्तियां, पर्याप्त मैनपावर और फैसले लेने की आजादी नहीं मिलेगी, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी।
इसके साथ उन्होंने एकल जिम्मेदारी तय करने भी सलाह दी। उन्होंने कहा कि विभागीय समन्वय के लिए भी एकल जिम्मेदारी तय करनी होगी। नाला सफाई और सड़कों की मरम्मत को एक सतत प्रक्रिया बनाने के बजाय इसे 'वार्षिक उत्सव' की तरह देखा जाता है, जो सिर्फ वर्षा से ठीक पहले खानापूरी के लिए होता है।
कुछ शहर दिखा रहे राह
ऐसा नहीं है कि देश के सारे शहर इस समस्या के आगे घुटने टेक चुके हैं। बेहतर इच्छाशक्ति और सही बजट प्रबंधन से कुछ शहरों ने मिसाल कायम की है। इंदौर, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, भुवनेश्वर और पुरी आदि 44 शहरों ने अर्बन मैनेजमेंट में बेहतरीन काम करके दिखाया है। इन शहरों ने न सिर्फ कागजों पर नीतियां बनाईं, बल्कि उनके लिए विशेष बजट आवंटित किया, जमीनी स्तर पर पायलट प्रोजेक्ट चलाए और उन्हें पूरी प्रशासनिक ताकत से लागू किया।
पुराने औजारों से नए दौर की जंग नहीं जीती जा सकती
भारत की आधी आबादी अब सुनहरे भविष्य की तलाश में शहरों की तरफ रुख कर रही है। 'हम पुराने औजारों से नई चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते।' यदि हमें अपने शहरों को रहने लायक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है, तो हमें ''जूम इन और जूम आउट'' (माइक्रो और मैक्रो) स्तर पर नीतिगत प्लानिंग करनी होगी। स्थानीय प्रशासन को सशक्त करने के लिए उन्हें फ्यूल (फंड) और ड्राइवर (कुशल मैनपावर) दोनों सौंपने होंगे।
प्रमुख बातें
- हर शहर का भूगोल और मिजाज अलग होता है। इसलिए देश के लिए एक जैसी योजना थोपने के बजाय 'शहर के मुताबिक रणनीति' बनानी होगी।
- तालाबों और वेटलैंड्स को खाली जमीन नहीं, बल्कि 'इंफ्रास्ट्रक्चर' माना जाए और वैश्विक स्तर की तर्ज पर इन्हें सहेजा जाए।
- नालों की सफाई साल में एक बार नहीं, बल्कि मासिक या तिमाही आधार पर पूरे वर्ष चलने वाली निरंतर प्रक्रिया होनी चाहिए।
- शहरों का मास्टर प्लान बनाने में आईआईटी और स्थानीय प्रतिष्ठित अकादमिक संस्थानों के कौशल और रिसर्च का इस्तेमाल होना चाहिए।
- भारत के पास ज्ञान की कोई कमी नहीं है, कमी है तो सिर्फ अपनी गलतियों से सीखकर उन्हें धरातल पर उतारने की इच्छाशक्ति की।
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