दिल्ली में कब होगी कृत्रिम वर्षा? प्रदूषण से निपटने की तैयारी में रेखा सरकार; क्लाउड सीडिंग के हुए दो ट्रायल
दिल्ली सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कृत्रिम वर्षा की योजना पर फिर से काम शुरू कर दिया ...और पढ़ें
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दिल्ली में कृत्रिम वर्षा कराने की योजना।
HighLights
दिल्ली में वायु प्रदूषण हेतु कृत्रिम वर्षा के ट्रायल पुनः शुरू।
इंदिरा गांधी एयरपोर्ट के पास दो क्लाउड सीडिंग परीक्षण संपन्न।
दिवाली-छठ के बाद और अधिक प्रयोगों की संभावना है।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कृत्रिम वर्षा कराने की योजना पर सरकार ने फिर काम शुरू कर दिया है। पिछले 15 दिनों में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के आसपास क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल किए गए हैं।
दीवाली और छठ के बाद कुछ और ट्रायल किए जाने की संभावना है। हालांकि, पिछले साल के प्रयोगों में अनुकूल नतीजे नहीं मिलने और सरकार की किरकिरी होने के बाद इस बार सरकार इस अभियान को लेकर सार्वजनिक घोषणा करने से बच रही है।
दैनिक जागरण से बातचीत में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि सरकार क्लाउड सीडिंग कराएगी, लेकिन मीडिया को इसकी जानकारी नहीं दी जाएगी। पिछले साल के ट्रायल में बारिश नहीं होने और नतीजों पर सवाल उठने के बाद सरकार इस बार प्रयोगों को लेकर सतर्क है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, हाल में किए गए दोनों ट्रायल करीब 30 हजार फीट की ऊंचाई पर किए गए। यह पिछले साल दिल्ली में लगभग 10 हजार फीट की ऊंचाई पर किए गए प्रयोगों से काफी अधिक है। दीवाली और छठ के बाद मौसम की अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर आगे के ट्रायल किए जा सकते हैं।
पिछले साल नहीं हुई थी वर्षा
दिल्ली सरकार ने पिछले साल सर्दियों में प्रदूषण से निपटने के लिए आईआईटी कानपुर के सहयोग से क्लाउड सीडिंग परियोजना शुरू की थी। इसके लिए पर्यावरण विभाग और आइआइटी कानपुर के बीच 25 सितंबर 2025 को समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे।
अक्टूबर 2025 में दो दौर के ट्रायल किए गए थे। प्रत्येक प्रयोग में सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड वाले चार-चार रासायनिक फ्लेयर्स छोड़े गए थे। हालांकि, इन प्रयोगों से वर्षा नहीं हुई। इसके बाद सरकार ने एक रिपोर्ट जारी कर दावा किया था कि वर्षा नहीं होने के बावजूद लक्षित क्षेत्रों में प्रदूषणकारी कणों के स्तर में कमी आई।
अनुकूल बादलों का होना जरूरी
क्लाउड सीडिंग मौसम में कृत्रिम बदलाव की एक तकनीक है। इसमें उपयुक्त बादलों में सिल्वर आयोडाइड या सोडियम क्लोराइड जैसे पदार्थ छोड़े जाते हैं, जिससे पानी की बूंदों या बर्फ के क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया तेज हो सके और वर्षा की संभावना बढ़े।
इसके लिए वातावरण में पर्याप्त नमी और अनुकूल बादलों का होना जरूरी है। ऐसे में यह तकनीक प्रदूषण नियंत्रण का स्थायी विकल्प नहीं, बल्कि अनुकूल मौसम में इस्तेमाल किया जा सकने वाला एक उपाय है।
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