सड़क की धूल और मशीनों पर आधे से भी ज्यादा बजट 'स्वाहा', जागरूकता पर 1 प्रतिशत भी नही; NCAP बजट पर उठे सवाल
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत दिल्ली में खर्च की प्राथमिकताओं पर सवाल उठे हैं। धूल नियंत्रण पर भारी ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर, एआई जेनरेटेड
HighLights
दिल्ली एनसीएपी में खर्च प्राथमिकताओं पर उठे सवाल।
धूल नियंत्रण पर भारी खर्च, जागरूकता पर कम।
योजना की प्रभावशीलता के लिए धन का प्रभावी उपयोग।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। स्वच्छ हवा के लिए शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) में खर्च की प्राथमिकताओं और बजट के इस्तेमाल पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, देश भर में धूल नियंत्रण पर करीब 13,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि जन-जागरूकता पर कुल बजट का महज एक प्रतिशत लगाया गया।
दिल्ली के आंकड़े भी बताते हैं कि योजना के तहत आवंटित धन का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया और खर्च का बड़ा हिस्सा सड़क की धूल तथा निर्माण मलबे के नियंत्रण पर केंद्रित रहा।
नहीं इस्तेमाल हुआ जारी बजट
फाउंडेशन फार रिस्पान्सिव गवर्नेंस के अध्ययन ‘फाइनेंसिंग क्लीन एयर’ के मुताबिक, 2020-21 से 2025-26 के दौरान दिल्ली के लिए एनसीएपी के तहत 113 करोड़ रुपये मंजूर किए गए।
इनमें से 81 करोड़ रुपये जारी हुए, लेकिन लगभग 14 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। अध्ययन के अनुसार, खर्च का बड़ा हिस्सा सड़क की धूल और निर्माण एवं तोड़फोड़ के मलबे के नियंत्रण पर गया।
क्या है योजना और कितनी मिली सफलता?
जनवरी 2019 में शुरू एनसीएपी का उद्देश्य शहरों में वायु प्रदूषण घटाने के लिए स्थानीय कार्ययोजनाओं को वित्तीय और तकनीकी सहायता देना है। इसमें सड़क की धूल, निर्माण गतिविधियों, वाहनों, उद्योगों और कचरा जलाने जैसे प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण शामिल है। वर्ष 2025-26 तक पीएम 10 के स्तर में 2017 के मुकाबले 40 प्रतिशत तक कमी लाने या निर्धारित राष्ट्रीय मानकों को हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था।
मशीनों से आगे बढ़ने की जरूरत
विशेषज्ञों के अनुसार योजना की उपयोगिता का आकलन केवल खर्च या खरीदी गई मशीनों से नहीं, बल्कि प्रदूषण के स्तर में वास्तविक बदलाव, धन के उपयोग और अलग-अलग स्रोतों पर नियंत्रण के आधार पर होना चाहिए।
दिल्ली में कम खर्च और सीमित मदों पर निर्भरता के बीच सवाल यही है कि स्वच्छ हवा के लिए तय धन का प्रभावी इस्तेमाल कैसे सुनिश्चित किया जाए। जागरूकता अभियानों से नागरिकों की भागीदारी बढ़ाकर कचरा जलाने और प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों को रोकने में मदद मिल सकती है।
सीआरईए के आकलन में व्यय की हिस्सेदारी
जनवरी 2026 में सेंटर फार रिसर्च आन रिसर्च एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा किए गए आकलन में भी एनसीएपी तथा 15वें वित्त आयोग के वायु गुणवत्ता अनुदानों के अंतर्गत विभिन्न गतिविधियों पर व्यय के वितरण में असंतुलन की ओर संकेत किया गया है।
-सड़क की धूल का प्रबंधन 68 प्रतिशत
-परिवहन 14 प्रतिशत
-कचरा प्रबंधन एवं बायोमास जलाना 12 प्रतिशत
-क्षमता निर्माण एवं निगरानी 3 प्रतिशत
-उद्योग, घरेलू ईंधन एवं जन-जागरूकता प्रत्येक मद एक प्रतिशत से कम
यदि व्यय का बड़ा हिस्सा सड़क की धूल पर ही केंद्रित हो जाए, तो दिल्ली व एनसीआर में पीएम 2.5 के लिए उत्तरदायी अन्य स्रोतों का पर्याप्त नियंत्रण नहीं हो पाएगा। औद्योगिक उत्सर्जन, घरेलू ईंधन और जन-जागरूकता पर प्रत्येक मद का व्यय एक प्रतिशत से कम भी था, जबकि क्षमता निर्माण एवं निगरानी पर संयुक्त व्यय लगभग तीन प्रतिशत बताया गया। उत्सर्जन कटौती, निगरानी की गुणवत्ता, वीओसी एवं ओजोन पूर्वगामी प्रदूषकों पर अनुसंधान तथा क्षेत्रीय वायु-क्षेत्र प्रबंधन के लिए धनराशि का अधिक प्रभावी उपयोग होना चाहिए।
-डा एस के त्यागी, पूर्व अपर निदेशक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
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