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दिल्ली सरकार ने तीन अधिकारियों पर केस चलाने की दी मंजूरी, 650 करोड़ के मेडिकल स्कैम का है मामला

Published: Wed, 30 Sep 2026 04:52 PM (GMT+05:30)

दिल्ली सरकार के अस्पतालों में 650 करोड़ के चिकित्सा उपकरण खरीद घोटाले में तीन सरकारी अधिकारियों - डॉ. विनोद कुमार ...और पढ़ें

दिल्ली में 650 करोड़ के चिकित्सा उपकरण खरीद घोटाले में अधिकारियों पर चलेगा मुकदमा। (एआई जेनरेटेड इमेज)

दिल्ली में 650 करोड़ के चिकित्सा उपकरण खरीद घोटाले में अधिकारियों पर चलेगा मुकदमा। (एआई जेनरेटेड इमेज)

HighLights

  1. 650 करोड़ के चिकित्सा उपकरण खरीद घोटाले में मुकदमा चलाने की अनुमति।

  2. डॉ. विनोद रंगा, डॉ. वत्सला अग्रवाल, नीरज चोपड़ा पर चलेगा केस।

  3. एसीबी ने फर्जी कंपनियों और अनियमित भुगतानों की जांच की।

राकेश कुमार सिंह, नई दिल्ली। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग से सरकारी अस्पतालों में की जाने वाली दवाओं, सर्जिकल उपकरणों, मरीजों की चादरों, एक्स-रे और एनेस्थीसिया से जुड़े उपकरणों की खरीद में 650 करोड़ का घोटाला किए जाने के मामले में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) द्वारा गिरफ्तार किए गए तीनों सरकारी अधिकारी डॉ. विनोद कुमार रंगा, डा.वत्सला अग्रवाल और नीरज चोपड़ा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है।

एसीबी ने कई महीने दिल्ली सरकार से इन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी थी, जिसपर सरकार की ओर से स्वीकृति प्रदान कर दी गई।

सीपीए के तत्कालीन प्रमुख डॉ. विनोद कुमार रंगा को गिरफ्तार किया

एसीबी ने सबसे पहले 18 जून को इस मामले में पहली बड़ी कार्रवाई करते हुए सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (सीपीए) के तत्कालीन प्रमुख डॉ. विनोद कुमार रंगा को गिरफ्तार किया था। आरोप था कि डॉ. रंगा के पास ही आपूर्तिकर्ताओं से आने वाले कागजात और रेट फिक्सिंग की फाइलें भेजी जाती थीं, जिसे वे टेंडर कमेटी के सामने रखते थे।

उसके बाद जुलाई में जांच का दायरा बढ़ने पर एसीबी ने तत्कालीन महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं डा. वत्सला अग्रवाल और लेखा विभाग के अधिकारी नीरज चोपड़ा को भी गिरफ्तार कर लिया था। जांच में यह बात सामने आई कि डीजीएचएस पद पर रहते हुए डा. वत्सला अग्रवाल को खरीद में हो रही अनियमितताओं की पूरी जानकारी थी, इसके बावजूद उन्होंने नियमों की अनदेखी कर फाइलों को आगे बढ़ने दिया।

आपत्ति के बावजूद अवैध भुगतानों की प्रक्रिया को मंजूरी देने का आरोप

वहीं नीरज चोपड़ा पर आपत्ति के बावजूद अवैध भुगतानों की प्रक्रिया को मंजूरी देने का आरोप है। इसके बाद पिछले हफ्ते इस पूरे घोटाले का मुख्य मास्टरमाइंड और निजी फार्मा वितरक राजीव कुमार रंगीला को भी आत्मसमर्पण करने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया। एसीबी द्वारा लुकआउट सर्कुलर जारी किए जाने और लगातार बढ़ते कानूनी शिकंजे के दबाव के चलते राजीव रंगीला ने आत्मसमर्पण कर दिया। कई दिनों तक पूछताछ के बाद उसे बुधवार को तिहाड़ जेल भेज दिया गया।

सरकारी खरीद के लिए निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक पोर्टल जेम के नियमों और दिशा-निर्देशों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। खरीद प्रक्रिया और भुगतान आलाइन जेम पोर्टल के माध्यम से होने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

जांच में सामने आया कि इस घोटाले को अंजाम देने के लिए कई फर्जी और शेल कंपनियां बनाई गईं। इनमें ''एफ मेड डिवाइसेज'', ''टेक्नोक्रेट्स'', ''राजश्री'', ''आशी सर्जिकल एंड फार्मास्यूटिकल्स'' और ''एम साहिब एंड संस प्राइवेट लिमिटेड'' जैसी कंपनियां शामिल हैं। इन कंपनियों का स्वामित्व कथित तौर पर घरेलू सहायकों या अन्य मोहरों के नाम पर कागजों में दिखाया गया था।

सरकारी राजकोष को भारी चूना लगा

मुख्य आरोपित निजी आपूर्तिकर्ता इन फर्जी कंपनियों के जरिए निर्माताओं से सांठगांठ कर सप्लाई का रेट तय करवाता था और भारी-भरकम कमीशन वसूलता था। कई सामानों और उपकरणों को बाजार की सामान्य दरों से कई गुना ज्यादा कीमतों पर खरीदा गया, जिससे सरकारी राजकोष को भारी चूना लगा।

घोटाले की भनक लगने पर जब लेखा विभाग के कुछ अधिकारियों ने नियमों के विरुद्ध किए जा रहे भुगतानों पर आपत्ति जताई, तो उन आपत्तियों को दरकिनार कर दिया गया। एसीबी की शुरुआती जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण टेंडर और वर्क आर्डर से जुड़ी फाइलें भी सचिवालय से गायब मिलीं।

एसीबी इस मामले में दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड तक फैले अवैध संपत्तियों और नेटवर्क की भी जांच कर रही है। साथ ही, इस सिलसिले में लगभग 12,000 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट भी अदालत में दाखिल की जा चुकी है, जिसमें कई अन्य संदिग्ध डाक्टरों, कर्मचारियों और आउटसोर्सिंग से जुड़े लोगों की भूमिकाओं की जांच की जा रही है।

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