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MCD के टोल नाके बने सिरदर्द, दिल्ली में प्रदूषण और जाम बढ़ने से घट रहा राजस्व; ठेका देने पर उठे सवाल

Published: Sun, 13 Sep 2026 07:39 AM (IST)

दिल्ली में एमसीडी के टोल नाके प्रदूषण बढ़ा रहे हैं और इनसे मिलने वाला राजस्व भी घट गया है। टोल ...और पढ़ें

टोल नाके बन रहे प्रदूषण का कारण।

टोल नाके बन रहे प्रदूषण का कारण।

HighLights

  1. एमसीडी टोल नाकों से प्रदूषण और जाम की समस्या बढ़ी।

  2. टोल से एमसीडी का राजस्व लक्ष्य से काफी कम रहा।

  3. विवादित कंपनी को फिर से टोल वसूली का ठेका मिला।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली में एमसीडी के टोल नाके एक तरफ प्रदूषण का कारण बन रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर इनसे मिलने वाला राजस्व भी घट गया है। जी हां, टोल से आने वाले राजस्व को अपनी आय का प्रमुख स्रोत बताने वाली एमसीडी का इससे राजस्व घटा है, वहीं इसके वसूलने से होने वाली परेशानी के साथ प्रदूषण भी बढ़ रहा है।

बताया गया कि आए दिन प्रमुख टोल नाकों पर व्यावसायिक वाहनों से वसूले जाने वाले ईसीसी (पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क) और एमसीडी टोल के कारण जाम लगता है। जिससे प्रदूषण बढ़ता है।

वाहनों का प्रवेश अनिवार्य

यह हालत तब है जब टोल नाकों से जाम खत्म करने के लिए एमसीडी ने 100 करोड़ से अधिक खर्च कर यहां पर रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन टैग आधारित वाहनों का प्रवेश अनिवार्य कर दिया था।

वहीं, बावजूद इसके दिल्ली के नौ टोल नाके (टिकरी बॉर्डर, केजीटी-सिंघु बॉर्डर, कापसहेड़ा बॉर्डर, आया नगर बॉर्डर, बदरपुर बॉर्डर, अप्सरा-शाहदरा बॉर्डर, न्यू मंडौली बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर और रजोकरी बॉर्डर) ऐसे हैं जहां पर विशेषकर व्यावसायिक वाहनों से एमसीडी द्वारा टोल वसूली के कारण जाम लगा रहता है।

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950 करोड़ सालाना ही पहुंचा

गौरतलब है कि दिल्ली में एमसीडी के 156 टोल नाके हैं, जिनसे एमसीडी को मिलने वाला राजस्व जहां 1800-2000 करोड़ पहुंचना चाहिए था और वह 950 करोड़ सालाना ही पहुंच पाया है।

दरअसल, वर्ष 2017 में एमसीडी ने 1206 करोड़ रुपये के सालाना अनुबंध पर इनका ठेका एमईपी नाम की कंपनी को दिया था। शुरुआत में कुछ समय तक तो कंपनी को राजस्व आया, लेकिन कोरोना में लगे लाकडाउन में राजस्व में छूट व अन्य कारणों से भुगतान का मामला फंस गया।

एमसीडी और कंपनी के बीच विवाद बढ़ा तो एमसीडी ने 2021 में सहकार ग्लोबल नाम की कंपनी को शुरुआत में तीन वर्षों के लिए यह काम दे दिया। लेकिन उस दौरान इसे मात्र 786 करोड़ के ही सालाना राजस्व पर काम दिया था। यानी 2017 के मूल ठेके से करीब 450 करोड़ कम।

टोल कंपनी के तीन वर्ष 2023 में पूरे हो गए थे, लेकिन एमसीडी की स्थायी समिति का गठन न होने का बहाना लेकर एमसीडी ने इसका एक-एक साल के लिए तीन बार विस्तार किया। अब भी नया ठेका इसी कंपनी को एमसीडी ने दिया है, लेकिन वह भी 950 करोड़ का ही है, जो कि 2017 के मूल ठेके से 250 करोड़ के करीब कम है।

टेंडर देने पर उठे सवाल

एमसीडी ने सहकार ग्लोबल नाम की जिस कंपनी को ठेका दिया है, उस पर सरकारी टोल में वसूली के दौरान राजस्व को नुकसान पहुंचाने के भी आरोप हैं। एमसीडी की पिछली स्थायी समिति की बैठक में आप पार्षद प्रवीण कुमार ने इस मुद्दे को उठाया था।

प्रवीण कुमार ने कहा कि इस कंपनी पर जुलाई 2026 में ही राजस्थान के शाहजहांपुर में एक टोल नाके पर टोल वसूली में राजस्व का नुकसान पहुंचाने का आरोप था, जिसमें राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया है। बावजूद इस कंपनी को हाल ही में फिर से ठेका देना समझ से परे है।

टोल नाके हटाने की सिफारिश कर चुकी है सरकार

दिल्ली की सीमाओं पर जाम और प्रदूषण कम करने के लिए नौ प्रमुख एमसीडी टोल नाकों को हटाने या स्थानांतरित करने की केंद्रीय वायु गुणवत्ता आयोग (सीएक्यूएम) ने सिफारिश की थी। इनमें टिकरी बॉर्डर, केजीटी-सिंघु बॉर्डर, कापसहेड़ा बॉर्डर, आया नगर बॉर्डर, बदरपुर बॉर्डर, अप्सरा-शाहदरा बॉर्डर, न्यू मंडौली बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर और रजोकरी बॉर्डर शामिल थे।

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