ग्लोबल रीसाइक्लिंग डे: दिल्ली में 36 प्रतिशत कचरा बिना प्रोसेसिंग-रीसाइकलिंग के पहुंच रहा लैंडफिल साइट
दिल्ली में कचरा प्रबंधन चिंताजनक है, जहां प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले कचरे का लगभग 36% बिना प्रसंस्करण या पुनर्चक्रण के ...और पढ़ें
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दिल्ली में कचरा प्रबंधन को लेकर स्थिति चिंताजनक।
HighLights
दिल्ली का 36% कचरा बिना प्रसंस्करण लैंडफिल में।
लैंडफिल पर बोझ, प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे।
स्रोत पर प्रसंस्करण व पुनर्चक्रण ही समाधान है।
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। राजधानी में कचरा प्रबंधन को लेकर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में प्रतिदिन निकलने वाले कचरे का लगभग 36 प्रतिशत बिना प्रोसेसिंग (प्रसंस्करण) और रीसाइकलिंग (पुनर्चक्रण) के सीधे लैंडफिल में पहुंच रहा है।
जो लैंडफिल पर बोझ बढ़ा रहा है, जबकि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 कहता है कि केवल इनर्ट यानी निष्क्रिय कचरा ही लैंडफिल में डाला जाना चाहिए। इससे प्रदूषण संग स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि स्रोत पर कचरे का प्रसंस्करण व पुनर्चक्रण सुनिश्चित किया जाए, तो लैंडफिल पर बोझ कम कर पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य दोनों की रक्षा की जा सकती है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा 2025 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 11,852 टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से करीब 64 प्रतिशत यानी 7585.28 करोड़ टन कचरे का ही वैज्ञानिक प्रसंस्करण व पुनर्चक्रण हो पाता है। जबकि 4266.72 करोड़ टन कचरा बिना प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण के सीधे लैंडफिल स्थलों पर पहुंचाया जा रहा है।
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और नगर निगम दिल्ली (एमसीडी) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार राजधानी के तीन प्रमुख लैंडफिल कुल मिलाकर करीब 1.7 करोड़ टन पुराना कचरा (लेगेसी) जमा है, जो लगातार बढ़ता जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार नियमों के कड़ाई से अनुपालन तथा जागरूकता से ही इस समस्या को काबू किया जा सकता है। इसलिए हर वर्ष 18 मार्च को ग्लोबल रीसाइक्लिंग डे (वैश्विक पुनर्चक्रण दिवस) मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य कचरे को संसाधन के रूप में देखना और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना है।
सीपीसीबी द्वारा 2025 में एनजीटी को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार
गाजीपुर लैंडफिल
जमा कचरा: लगभग 84 लाख टन
भलस्वा लैंडफिल
जमा कचरा: लगभग 55 लाख टन
ओखला लैंडफिल
जमा कचरा: लगभग 34 लाख टन
कुल कचरा (तीनों मिलाकर) लगभग 1.73 करोड़ टन
क्या-क्या होता है इस कचरे में
-जैविक कचरा (भोजन अवशेष, सब्जी-फल के छिलके)
-प्लास्टिक और पैकेजिंग सामग्री
-कागज, कांच और धातु
-इलेक्ट्रानिक कचरा
-निर्माण एवं ध्वंस मलबा
-घरेलू खतरनाक कचरा (दवाइयां, रसायन)
बीमारियों का बढ़ता खतरा
इस तरह के कचरे को लेकर पर्यावरण व सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि लैंडफिल से निकलने वाली मीथेन, अमोनिया व अन्य विषैली गैस वायु को प्रदूषित करती हैं, जबकि कचरे के ढेर से निकलने वाला प्रदूषित पानी (लीचेट) भूजल को दूषित कर रहा है।
इस कारण
-सांस संबंधी रोग (अस्थमा, ब्रोंकाइटिस)
-त्वचा रोग और एलर्जी
-डेंगू, मलेरिया जैसे वेक्टर जनित रोग
-दीर्घकालिक रूप से हृदय और फेफड़ों की बीमारियां हो रही हैं।
क्या कहता हैं नियम
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अनुसार
-स्रोत पर कचरे का पृथक्करण अनिवार्य है, जबकि ऐसा नहीं हो रहा है।
-अधिकतम कचरे का प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण किया जाना चाहिए
-केवल इनर्ट (निष्क्रिय) और प्रसंस्करण के बाद बचा कचरा ही लैंडफिल में डाला जा सकता है
इसके बावजूद बड़ी मात्रा में मिश्रित और बिना उपचारित कचरा लैंडफिल तक पहुंच रहा है, जो नियमों का खुला उल्लंघन हैं।
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