विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

बिना नोटिस छात्र को निकाला, हाई कोर्ट ने DU को लगाई फटकार; कहा- तानाशाही जैसा रवैया

Published: Thu, 01 Oct 2026 07:45 PM (GMT+05:30)

दिल्ली हाई कोर्ट ने बिना किसी नोटिस या सुनवाई के छात्र के निष्कासन पर दिल्ली विश्वविद्यालय को फटकार लगाई है। ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने डीयू प्रशासन पर तल्ख टिप्पणी की है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने डीयू प्रशासन पर तल्ख टिप्पणी की है।

HighLights

  1. डीयू ने बिना नोटिस छात्र को निष्कासित किया था।

  2. हाई कोर्ट ने इसे तानाशाही रवैया करार दिया।

  3. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने पर जोर दिया।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। बिना किसी नोटिस या सुनवाई के डीयू द्वारा एक छात्र के निष्कासन पर रोक लगाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने डीयू प्रशासन पर तल्ख टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने टिप्पणी की कि इस तरह से शक्ति का इस्तेमाल तानाशाही जैसा रवैया दर्शाता है और कानून के शासन वाले समाज में इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

सबसे कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई कैसे?

याचिकाकर्ता छात्र को अपने पाठ्यक्रम को जारी रखने की इजाजत देते हुए पीठ ने कहा कि जिस शैक्षणिक संस्थान से उम्मीद की जाती है कि वह अपने छात्रों में अनुशासन, निष्पक्षता और कानून के शासन के प्रति सम्मान पैदा करेगा, उसके लिए यह समझना मुश्किल है कि वह प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का पालन किए बिना किसी छात्र पर सबसे कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई कैसे कर सकता है।

लगातार गलत व्यवहार करने का आरोप

अदालत ने रिकाॅर्ड पर लिया कि डीयू के ओपन लर्निंग डेवलपमेंट सेंटर ने याचिकाकर्ता को 10 सितंबर को निष्कासित कर दिया था। वह सेंटर ऑफ इनोवेटिव स्किल बेस्ड कोर्सेज में बेकरी और कन्फेक्शनरी के छह महीने के सर्टिफिकेट कोर्स में दाखिला लिए हुए था। उस पर क्लासरूम में मोबाइल के इस्तेमाल के साथ ही लगातार गलत व्यवहार करने का आरोप था।

छात्र से कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा गया

उक्त तथ्यों को देखते हुए पीठ ने कहा कि संस्थान की स्वायत्तता उसे अनुशासन बनाए रखने के लिए बेलगाम शक्तियां नहीं देती है। पीठ ने कहा कि डीयू प्रशासन ने बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए जिस तरह से कार्रवाई की है, वह कम से कम तानाशाहीपूर्ण तो है ही। पीठ ने कहा कि निष्कासन आदेश जारी करने से पहले छात्र से कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा गया था।

पक्ष रखने का सार्थक मौका देना जरूरी

ऐसे में निष्कासन की कार्रवाई प्रथम दृष्टया प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है। पीठ ने कहा कि किसी छात्र को अधिकारियों के सामने अपना पक्ष रखने का सार्थक मौका देना बहुत जरूरी है, क्योंकि ऐसा न करने पर छात्र अपनी पढ़ाई जारी रखने के मौके से वंचित हो सकता है।

यह भी पढ़ें- IIT Delhi में ऋषिकेश की मौत की जांच रिपोर्ट फिर टली, तारीख बढ़ने से छात्र नाराज; अब 10 अक्टूबर तक बढ़ी तारीख