'नाबालिग से दुष्कर्म की सजा रद करना न्याय का मजाक' POCSO केस में समझौते पर दिल्ली HC सख्त
दिल्ली हाई कोर्ट ने पाक्सो अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को समझौते के आधार पर रद्द करने से इनकार कर दिया है।

POCSO केस में दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला। फोटो: आर्काइव
HighLights
पाक्सो सजा समझौते के आधार पर रद्द नहीं होगी
नाबालिगों की सुरक्षा सभ्य समाज की बड़ी चिंता
समझौता न्याय का मजाक उड़ाने जैसा होगा
विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। नाबालिग से दुष्कर्म जैसे संगीन अपराध के मामले में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पाक्सो) अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के बाद पीड़िता से समझौते के आधार पर राहत देने से इनकार करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।
अदालत ने कहा कि नाबालिगों की सुरक्षा सभ्य समाज में बड़ी चिंता का विषय है। अदालत ने कहा कि ऐसे संगीन अपराध के तहत दोषी ठहराए जाने के बाद, प्राथमिकी और सजा को रद करने के लिए किसी समझौते को स्वीकार करना न्याय का मजाक उड़ाने व अदालत के विशेष न्यायसंगत अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग करने जैसा होगा।
समझौते के आधार पर सजा रद नहीं हो सकती
न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ ने कहा कि दोषी व शिकायतकर्ता के बीच समझौते के आधार पर पाक्सो अधिनियम के तहत मिली सजा को रद नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा कि इस मामले में किया गया समझौता पूरी तरह से अविश्वसनीय है और ऐसे समझौते को स्वीकार करना सरकार, जनता और विशेष रूप से नाबालिगों के हितों के खिलाफ होगा।
16 साल की पीड़िता, आरोपित 27 साल का था
अदालत ने कहा कि यह मामला रोमियो-जूलियट जैसा मामला नहीं है, क्योंकि घटना के समय पीड़िता की उम्र 16 साल और आरोपी 27 साल का था।
पीठ ने पाया कि ट्रायल कोर्ट के सामने पीड़िता अपने बयान पर कायम रही और इसके चलते आरोपी को दोषी ठहराया गया था। अदालत ने समझौते का मुख्य आधार यह बताया गया कि पीड़िता व दोषी पड़ोसी थे, लेकिन यह कारण अदालत को संतुष्ट करने के लिए काफी नहीं है।
दोषी ने 2019 में तिगरी पुलिस स्टेशन में हुई प्राथमिकी और दोषसिद्धि को समझौते के आधार पर रद करने की मांग की थी।
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