'मां के होते दादा को नहीं मिलेगी पोते-पोती की कस्टडी', दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने पोते-पोती की कस्टडी मांगने वाली दादा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मां को अयोग्य ...और पढ़ें
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वर्किंग मदर से नहीं छीन सकते बच्चों की कस्टडी।
विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। पोते-पोती की कस्टडी मांगने वाली एक दादा की याचिका को खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि मां को अयोग्य या लापरवाह साबित किए बगैर उसके अधिकार को नहीं छीन सकते।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद व न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की पीठ ने पाया कि महिला आयकर अधिकारी है और न सिर्फ वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र है, बल्कि अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही है।
'बच्चों को मां से नहीं कर सकते अलग'
पीठ ने कहा कि मां के अधिकार परिवार के अन्य सदस्यों पर कानूनी रूप से सर्वोच्च रहेंगे और न तो मां को बच्चों से वंचित किया जा सकता और न ही बच्चों को उनकी मां से वंचित किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि मां की स्वाभाविक अभिभावकता को मनमाने तरीके से नहीं हटाया जा सकता।
अदालत ने उक्त टिप्पणी पारिवारिक अदालत के 15 मई 2026 के फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए की। पारिवारिक कोर्ट ने शांतनु ग्रोवर और उसकी बहन मन्नत ग्रोवर की कस्टडी दादा को देने से इन्कार कर दिया था। बच्चों के पिता का निधन दिसंबर 2016 में हो गया था और तब से बच्चे अपनी मां के साथ रह रहे हैं।
दादा ने अपील याचिका दायर कर कहा था कि उनके पोते-पोती की मां एक वर्किंग प्रोफेशनल हैं और वह बच्चों की परवरिश के लिए पर्याप्त समय और बेहतर माहौल नहीं दे सकतीं।
अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया
हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया कि बच्चों की उम्र लगभग 17 और 14 साल है और उन्होंने पारिवारिक अदालत में स्वतंत्र रूप से मां के साथ रहने की इच्छा जताई थी। उक्त तथ्यों को देखते हुए पीठ ने कहा कि ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि बच्चों को सिखाया-पढ़ाया गया हो।
दादा की ओर से 2016 से पहले के वैवाहिक विवाद और क्रूरता के आरोपों को भी पीठ ने अप्रासंगिक बताया। हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि बड़ी पोती बालिग है, इसलिए उसे दादा-दादी से मिलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। फिर भी दादा चाहें तो फैमिली कोर्ट में विजिटेशन राइट्स के लिए अलग आवेदन दायर कर सकते हैं, इस पर बच्चों की इच्छा को महत्व देते हुए फैसला होगा।
