बिना ट्रीटमेंट सीवर में गंदा पानी छोड़ने पर हाईकोर्ट सख्त, मिठाई यूनिट पर लगाया 10 लाख का जुर्माना
दिल्ली हाईकोर्ट ने चांदनी चौक की एक मिठाई यूनिट को सार्वजनिक सीवर में बिना ट्रीट किया गंदा पानी छोड़ने का ...और पढ़ें

सार्वजनिक सीवर में बिना ट्रीट किया हुआ गंदा पानी छोड़ने के लिए दोषी ठहराने के ट्रायल कोर्ट के निर्णय को दिल्ली हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है।

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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। चांदनी चौक में मिठाई बनाने वाली एक यूनिट को यमुना नदी में जाने वाले सार्वजनिक सीवर में बिना ट्रीट किया हुआ गंदा पानी छोड़ने के लिए दोषी ठहराने के ट्रायल कोर्ट के निर्णय को दिल्ली हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। हालांकि, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने कारावास की सजा को रद कर दिया, लेकिन अपीलकर्ता यूनिट पर लगाई गई जुर्माना राशि को बढ़ा दिया।
जिम्मेदारी से बरी नहीं किया जा सकता
अदालत ने रिकाॅर्ड पर लिया कि याची ने दो लाख रुपये जमा कर दिए हैं। अदालत ने कहा कि याची को दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के समक्ष 10 लाख रुपये का भुगतान करना होगा। अदालत ने कहा कि छोटे भोजनालय, रेस्टोरेंट और फूड प्रोसेसिंग यूनिट से निकलने वाला गंदा पानी बगैर शोधित किए सीवर और नालियों में छोड़ा जाता है जो नदियों में जाते हैं। इस प्रकार वे सामूहिक रूप से प्रदूषण में काफी योगदान देते हैं। ऐसे संस्थानों को सिर्फ आकार के आधार पर अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं किया जा सकता।
गंदे पानी को सीधे नगर निगम के सीवर में छोड़ा
यह मामला तीन जून 2000 को डीपीसीसी द्वारा किए गए एक निरीक्षण से सामने आया था। यह निरीक्षण यमुना प्रदूषण मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों के बाद किया गया था। निरीक्षण के दौरान मिष्ठान की दुकान को चालू पाया गया था और वह बर्तन और फर्श धोने से निकलने वाले बिना ट्रीट किए गए गंदे पानी को सीधे नगर निगम के सीवर में छोड़ते हुए पाया गया था।
अभियोजन पक्ष के केस को कमजोर नहीं करता
ट्रायल कोर्ट के निर्णय को चुनौती देने वाली दुकान मालिक कंवरजीत राज कुमार की अपील याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि निरीक्षण के दौरान नमूना न लेना या तस्वीरों का न होना अभियोजन पक्ष के केस को कमजोर नहीं करता है। अदालत ने कहा कि एक बार जब बिना ट्रीट किए गए गंदे पानी को छोड़ने का आरोप साबित हो जाता है, तो जल अधिनियम के तहत अपराध साबित हो जाता है।
10 लाख का अतिरिक्त जुर्माना देने का निर्देश
हालांकि, सजा के सवाल पर अदालत ने जल संशोधन अधिनियम 2024 पर ध्यान दिया, जिसके तहत जेल की सजा को 15 लाख रुपये तक के जुर्माने से बदलता है। इसलिए, कोर्ट ने जेल की सजा को रद करते हुए याचिकाकर्ता को पहले से जमा किए गए दो लाख रुपये के अलावा डीपीसीसी को 10 लाख का अतिरिक्त जुर्माना देने का निर्देश दिया।
