'बच्चा कोई वस्तु नहीं', पिता को मुलाकात के लिए जीतना होगा बच्चे का भरोसा; दिल्ली हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
दिल्ली हाई कोर्ट ने बच्चे से मुलाकात न होने पर मां के खिलाफ अवमानना कार्रवाई से इनकार किया है। अदालत ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने बच्चे से मुलाकात नहीं होने पर मां के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करने से इंकार किया। एआई इमेज
HighLights
हाई कोर्ट ने मां के खिलाफ अवमानना कार्रवाई से इनकार किया।
अदालत ने कहा बच्चा वस्तु नहीं, जबरन मुलाकात नहीं।
पिता को बच्चे का विश्वास जीतने की जरूरत है।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने बच्चे से मुलाकात नहीं होने पर मां के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करने से इंकार कर दिया है।
अदालत ने कहा कि बच्चे को किसी वस्तु की तरह नहीं माना जा सकता, जिसे जबरन किसी अभिभावक से मिलवाया जाए। पिता को बच्चे के साथ अच्छा रिश्ता बनाने और उसका विश्वास जीतने की जरूरत है।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने सात अक्टूबर को दिए आदेश में कहा कि मां ने फैमिली कोर्ट के निर्देश पर बच्चे को पेश किया था। ऐसे में सिर्फ इसलिए मां को अदालत के आदेश की अवहेलना का दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि मुलाकात पिता की इच्छा के मुताबिक नहीं हुई।
जन्मदिन पर मुलाकात का था आदेश
मामला फैमिली कोर्ट के सात सितंबर 2026 के आदेश से जुड़ा है। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि मां 10 सितंबर को दोपहर 12 बजे बच्चे को कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर स्थित चिल्ड्रन मीटिंग रूम में लेकर आएंगी। पिता बच्चे को अपने साथ ले जाएंगे और शाम पांच बजे उसी जगह मां को वापस सौंप देंगे।
बच्चे के जन्मदिन पर मुलाकात तय की गई थी। मां ने बताया था कि बच्चे को सुबह जन्मदिन मनाने के लिए प्ले स्कूल जाना है। इसके बाद दोनों पक्षों की सहमति से मुलाकात का समय तय हुआ था।
पिता ने लगाया था रोकने का आरोप
पिता इशु शौरी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि मां बच्चे को लेकर पहुंचीं, लेकिन उन्हें बच्चे को अपने साथ ले जाने से रोका। उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट में समझाने की कोशिश भी की गई, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी।
हाई कोर्ट ने कहा कि मुलाकात पिता की संतुष्टि के मुताबिक नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि मां ने अदालत के आदेश का उल्लंघन किया है।
अदालत ने अवमानना याचिका का निपटारा करते हुए पिता को प्रधान फैमिली जज के पास जाने की छूट दी। प्रधान फैमिली जज दोनों पक्षों को समझाकर मुलाकात का रास्ता निकाल सकते हैं। हाई कोर्ट ने बच्चे की अभिरक्षा से जुड़े पुराने आदेश में कोई बदलाव नहीं किया।
