'बिना सुनवाई कंपनी को टेंडर से बाहर नहीं कर सकते', दिल्ली हाई कोर्ट ने NTPC का निलंबन आदेश किया रद
दिल्ली हाई कोर्ट ने एनटीपीसी द्वारा ग्रू एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड पर लगाए गए छह महीने के निलंबन आदेश को रद कर दिया है।

HighLights
हाई कोर्ट ने एनटीपीसी का निलंबन आदेश रद किया
बिना सुनवाई कंपनी को टेंडर से बाहर करना गलत
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। सरकारी कंपनियां किसी निजी कंपनी को बिना कारण बताओ नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए भविष्य की निविदाओं (टेंडर) से बाहर नहीं कर सकती है। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना किसी कंपनी पर निलंबन या प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
न्यायमूर्ति तेजस कारिया और न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने सौर माड्यूल निर्माता कंपनी ग्रू एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनटीपीसी रिन्यूएबल एनर्जी लिमिटेड (एनआरईएल) द्वारा लगाया गया छह माह का निलंबन आदेश रद कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि कंपनी ने अनुबंध का पालन नहीं किया और आवश्यक कांट्रैक्ट परफार्मेंस गारंटी (सीपीजी) जमा नहीं की, इसलिए उसे डिफाल्टर मानने का एनटीपीसी का निर्णय सही था।
क्या है पूरा मामला?
मामला उत्तर प्रदेश में 1000 मेगावाट सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए सोलर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल की आपूर्ति संबंधी निविदा से जुड़ा था। दिसंबर 2025 में ग्रू एनर्जी को ठेका मिला था, लेकिन कंपनी ने न तो औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए और न ही निर्धारित प्रदर्शन गारंटी जमा की। कंपनी ने दलील दी कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे माल की कीमतें व परिवहन लागत बढ़ गई थीं। इसलिए उसे अनुबंध पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए था।
हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि कंपनी जिन परिस्थितियों का हवाला दे रही है, वे वास्तव में बाजार की प्रतिकूल स्थितियों से उत्पन्न व्यावसायिक कठिनाइयां थीं। हालांकि, अदालत ने एनटीपीसी द्वारा कंपनी को छह माह के लिए भविष्य की निविदाओं में भाग लेने से रोकने के फैसले पर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि इस आदेश के गंभीर व्यावसायिक और नागरिक परिणाम होते हैं, क्योंकि इससे कंपनी न केवल भविष्य के टेंडरों से बाहर हो जाती है बल्कि लंबित निविदाओं में उसकी बोली भी प्रभावित हो सकती है।
पीठ ने कहा कि निलंबन और प्रतिबंध का प्रभाव लगभग समान होता है, इसलिए ऐसी कार्रवाई से पहले संबंधित पक्ष को कारण बताओ नोटिस देना और अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान करना अनिवार्य है। चूंकि एनटीपीसी ने ऐसा नहीं किया, इसलिए निलंबन आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत पाया गया और उसे रद कर दिया गया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महज कीमतों में वृद्धि, व्यावसायिक नुकसान या आपूर्ति संबंधी कठिनाइयों के आधार पर कंपनियां अपने संविदात्मक दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकतीं। साथ ही एनटीपीसी की पुन निविदा प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इन्कार करते हुए अदालत ने क्षतिपूर्ति और अन्य संविदात्मक दावों के प्रश्न भविष्य की उचित कानूनी कार्यवाही के लिए खुले छोड़ दिए।
