आठ साल बाद चार्जशीट दाखिल करना पड़ा भारी, दिल्ली हाईकोर्ट ने रद की आपराधिक कार्यवाही
दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपपत्र दाखिल करने में आठ साल की देरी के कारण एक आपराधिक कार्यवाही रद कर दी। कोर्ट ...और पढ़ें

आबकारी से जुड़े एक मामले में एक व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद की।
HighLights
दिल्ली हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द की।
आरोपपत्र दाखिल करने में आठ साल की देरी।
अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित ट्रायल का उल्लंघन।
विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपपत्र दाखिल करने में बहुत ज़्यादा देरी से संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत आरोपित के तेजी से जांच और ट्रायल के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
आबकारी से जुड़े एक मामले में एक व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद करते हुए न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज की पीठ ने कहा कि जांच पूरी करने के लिए समय-सीमा तय करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन उन्हें अनिश्चित काल तक जारी नहीं रहने दिया जा सकता।
आठ साल बाद चार्जशीट दाखिल की
कोर्ट ने रिकाॅर्ड किया कि प्राथमिकी होने के लगभग आठ साल बाद चार्जशीट दाखिल की गई। कोर्ट ने कहा कि जांच का समय पर पूरा होना आरोपी का एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जो अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित है।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि तेजी से ट्रायल में जांच, पूछताछ, ट्रायल और अपील के सभी चरण शामिल हैं और यह आरोप से लेकर अंतिम फैसले तक चलते हैं। औपचारिक आरोप और ट्रायल के बीच अनुचित देरी से आरोपित के बचाव पक्ष पर बुरा असर पड़ने का खतरा रहता है।
आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने को चुनौती
अदालत ने उक्त टिप्पणी व आदेश याचिकाकर्ता जयवीर सिंह द्वारा की याचिका पर दिया। याचिका में जनवरी 2015 में दिल्ली आबकारी अधिनियम-2009 की धारा-33 और धारा-38 के तहत की गई प्राथमिकी से शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने को चुनौती दी गई।
उन्होंने तर्क दिया था कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष आरोपपत्र लगभग आठ साल बाद यानी चार नवंबर 2022 को दाखिल की गई थी।
अदालत ने रिकाॅर्ड पर लिया कि आरोपपत्र एक हेड कान्स्टेबल ने तैयार की थी और संबंधित असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस (एसीपी) ने इसे चार मई 2018 को ट्रायल कोर्ट को भेजा था। हालांकि, इसे ट्रायल कोर्ट के सामने तीन नवंबर 2022 को ही पेश किया गया था।
आरोपपत्र दाखिल करने में हुई देरी को सही ठहराया
कोर्ट ने पाया कि भले ही देरी के लिए हेड कान्स्टेबल के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई, लेकिन इससे न तो आरोपपत्र दाखिल करने में हुई देरी को सही ठहराया जा सकता था और न ही आरोपित को कोई राहत मिल सकती थी। इसके कारण आरोपित को आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ रहा था। पीठ ने यह भी देखा कि यह देरी जांच अधिकारियों के बजाय अन्य वजहों से हुई थीं।
