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POCSO मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला, अपराध की कोशिश पर पूरी सजा नहीं

Published: Sun, 19 Apr 2026 06:52 PM (IST)

दिल्ली हाई कोर्ट ने पॉक्सो मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी पर अपराध की ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने पॉक्सो मामले में अहम फैसला सुनाया है। फाइल फोटो

दिल्ली हाई कोर्ट ने पॉक्सो मामले में अहम फैसला सुनाया है। फाइल फोटो

विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पाक्सो) अधिनियम के मामले में एक दोषी को आंशिक रूप से राहत देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने निर्णय दिया है कि अगर किसी पर अपराध करने की कोशिश करने का आरोप हो तो उसे पाक्सो के तहत पूरे हो चुके अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने उक्त टिप्पणी यह नोट करते हुए की कि अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट ने पाक्सो की धारा 10 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा-नौ (एम) के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न करने के अपराध के लिए दोषी ठहराते हुए उसे पांच साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

वहीं, हाई कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता के खिलाफ लगाया गया आरोप अधिनियम की धारा 18 के तहत महज गंभीर यौन उत्पीड़न करने की कोशिश का था।

अदालत ने उक्त टिप्पणी के साथ साढ़े चार साल की नाबालिग का यौन उत्पीड़न के आरोपों में दोषी ठहराए जाने के खिलाफ अपीलकर्ता की अपील को आंशिक रूप से मंजूरी दे दी।

सुबूतों की जांच करते हुए अदालत ने पाया कि उपलब्ध सामग्री से गंभीर यौन उत्पीड़न का मामला बनता है, फिर भी आरोपी को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उस पर आरोप सिर्फ अपराध की कोशिश का लगाया गया था।

पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को यौन उत्पीड़न करने के अपराध के लिए दोषी ठहराने में जाहिर तौर पर गलती की, क्योंकि उस पर कभी भी इस अपराध का आरोप नहीं लगाया गया था। ऐसे में दोषी ठहराए जाने के फैसले में बदलाव करते हुए उसे पाक्सो की धारा-नौ (एम) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा-18 के तहत दोषी ठहराया।

सजा के बिंदु पर अदालत ने पाया कि अधिनियम की धारा-18 के तहत, अपराध करने की कोशिश के लिए दी जाने वाली सजा, अपराध करने के लिए तय की गई अधिकतम सजा की आधी से ज्यादा नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि धारा-10 के तहत अधिकतम सजा सात साल है, इसलिए सजा को घटाकर साढ़े तीन साल की कठोर कारावास किया जाता है।

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