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'गृहिणी की आय का आकलन सिर्फ न्यूनतम मजदूरी पर नहीं, वास्तविक योगदान भी देखें' दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी

Published: Sun, 05 Jul 2026 03:40 PM (IST)

दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि गृहिणियों के मुआवजे का आकलन केवल न्यूनतम मजदूरी पर नहीं, बल्कि उनके ...और पढ़ें

गृहणियों की आय को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने की अहम टिप्पणी।

गृहणियों की आय को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने की अहम टिप्पणी।

HighLights

  1. गृहिणियों के मुआवजे का आकलन न्यूनतम मजदूरी से ऊपर, वास्तविक योगदान महत्वपूर्ण।

  2. दिल्ली हाई कोर्ट ने गृहिणियों के घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्य माना।

  3. सड़क दुर्घटना पीड़िता के मुआवजे में 8.39 लाख रुपये की वृद्धि की।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि किसी गृहिणी की आय या शैक्षणिक योग्यता का दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं है, तो मुआवजा तय करते समय अदालतें केवल अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी को आधार मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। गृहिणी के घरेलू कार्य और परिवार में उसके वास्तविक योगदान का भी उचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति अनिश दयाल की पीठ ने सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होकर स्थायी दिव्यांगता का शिकार हुई उमा रानी को दिए गए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) के मुआवजे को अपर्याप्त मानते हुए उसमें 8,39,142 रुपये की वृद्धि कर दी। साथ ही बढ़ी हुई राशि पर दावा याचिका दाखिल करने की तिथि से नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी निर्देश दिया।

सबसे कम न्यूनतम मजदूरी अपनाना उचित नहीं: हाई कोर्ट

हाई कोर्ट ने कहा कि गृहिणी द्वारा किए जाने वाले घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्य तय करने का कोई निश्चित पैमाना नहीं हो सकता। इसलिए केवल सबसे कम न्यूनतम मजदूरी अपनाना उचित नहीं है। अदालत ने माना कि गृहिणी की काल्पनिक मासिक आय 10 हजार रुपये मानी जानी चाहिए, जिसमें घरेलू देखभाल और सेवाओं का मूल्य भी शामिल है।

अदालत ने यह भी माना कि दुर्घटना और पैर काटने की सर्जरी के बाद महिला कम से कम छह माह तक काम करने की स्थिति में नहीं रही होगी। इसलिए आय की क्षति भी छह माह की अवधि के आधार पर तय की जानी चाहिए।

भविष्य की आय क्षमता पर प्रभाव का आकलन करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि चिकित्सकीय दिव्यांगता और कार्यात्मक (फंक्शनल) दिव्यांगता अलग-अलग होती हैं। हालांकि मेडिकल दिव्यांगता 63 प्रतिशत थी, लेकिन महिला की कार्यात्मक दिव्यांगता 50 प्रतिशत मानी गई।

रखरखाव के लिए एक लाख रुपये देने का भी आदेश

अदालत ने कृत्रिम पैर और उसके रखरखाव के लिए एक लाख रुपये देने का भी आदेश दिया। वहीं आजीवन शारीरिक और मानसिक पीड़ा को देखते हुए दर्द एवं कष्ट तथा मानसिक एवं शारीरिक आघात के लिए दो-दो लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया।

हाई कोर्ट ने कहा कि गृहिणियों के निश्शुल्क घरेलू कार्यों का भी महत्वपूर्ण आर्थिक मूल्य होता है और मुआवजा तय करते समय उनके योगदान का यथार्थवादी आकलन किया जाना चाहिए। अदालत ने बीमा कंपनी को बढ़ी हुई मुआवजा राशि चार सप्ताह के भीतर एमएसीटी में जमा कराने का निर्देश दिया।

मामले में उमा रानी का सड़क हादसे में बायां पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा था और उन्हें बाएं पैर में 63 प्रतिशत स्थायी शारीरिक दिव्यांगता हुई थी। एमएसीटी ने उनकी आय का आकलन अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी के आधार पर किया था और आय की क्षति केवल एक महीने की मानी थी।

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