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शराब नीति पर एलजी से हुई थी चर्चा, फिर सिर्फ अरविंद केजरीवाल पर ही साजिश का आरोप क्यों? कोर्ट ने उठाया सवाल

Published: Sun, 01 Mar 2026 01:48 PM (IST)

विशेष सीबीआई अदालत ने दिल्ली आबकारी नीति मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि नीति निर्माण में ...और पढ़ें

सीबीआई की विशेष कोर्ट ने शराब घोटाले के आरोप से अरविंद केजरीवाल समेत 23 लोगों को किया है बरी। फोटो: आर्काइव

सीबीआई की विशेष कोर्ट ने शराब घोटाले के आरोप से अरविंद केजरीवाल समेत 23 लोगों को किया है बरी। फोटो: आर्काइव

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली की रद हो चुकी आबकारी नीति को लेकर विशेष सीबीआई कोर्ट ने कहा है कि नीति बनाते समय तत्कालीन उपराज्यपाल (एलजी) से चर्चा की गई थी और उनका सचिवालय भी पूरी प्रक्रिया में शामिल था। ऐसे में सिर्फ एक संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ साजिश का आरोप लगाना ठीक नहीं है।

विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने अभियोजन पक्ष के उस आरोप को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने नीति में अपने स्तर पर बदलाव किए और बाद में उन्हें एलजी के नाम पर डाल दिया।

रिकॉर्ड में साफ है कि परामर्श हुआ था

अदालत ने कहा कि फाइलों में दर्ज नोटिंग्स से साफ है कि नीति बनाने के दौरान एलजी से चर्चा हुई, उनके सुझाव शामिल किए गए, मंत्रिपरिषद से मंजूरी ली गई और बाद में एलजी को जानकारी भी दी गई। अदालत के अनुसार, यह प्रक्रिया छिपाकर नहीं की गई, बल्कि तय संवैधानिक नियमों के तहत पूरी की गई।

एक ही दस्तावेज से अलग-अलग निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते

कोर्ट ने कहा कि जब दस्तावेजों में एलजी और सरकार दोनों की भागीदारी दिख रही है, तो उसी रिकॉर्ड के आधार पर एक को दोषी और दूसरे को निर्दोष नहीं कहा जा सकता।

अगर नीति बनाने में गड़बड़ी मान ली जाए, तो सवाल उन सभी पर उठेगा जो इस प्रक्रिया का हिस्सा थे। लेकिन अभियोजन ने ऐसा नहीं किया।

एलजी सचिवालय के अधिकारियों की गवाही

कोर्ट ने एलजी सचिवालय के अधिकारियों के बयानों का भी जिक्र किया। अधिकारियों ने किसी तरह की गड़बड़ी या गलत तरीके से सुझाव जोड़ने की बात से इनकार किया।

सीबीआई का कहना था कि एलजी अनिल बैजल ने केवल एक बदलाव सुझाया था, जबकि सरकार ने सात बदलाव किए। लेकिन अदालत ने कहा कि दस्तावेज साझा चर्चा की ओर इशारा करते हैं।

एलजी कार्यालय पर कोई टिप्पणी नहीं

अदालत ने साफ किया कि उसके आदेश का मतलब यह नहीं है कि किसी और संवैधानिक पदाधिकारी को आरोपी बनाया जाना चाहिए था। न्यायालय ने कहा कि एलजी का पद संवैधानिक है, इसलिए उस पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी करना उचित नहीं है।

अंत में अदालत ने कहा कि जब यह साबित हो जाता है कि नीति तय नियमों और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ी, तो सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ साजिश का आरोप टिक नहीं सकता है।

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