दिल्ली के बुजुर्गों पर मंडराया बड़ा खतरा, 3°C तापमान बढ़ा तो साल में 2,020 घंटे सहनी होगी जानलेवा गर्मी
दिल्ली के बुजुर्गों को वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण गंभीर 'अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस' (UHS) का सामना करना पड़ सकता है। ...और पढ़ें

बुजुर्गोँ के लिए जानलेवा बन सकती है गर्मी । फोटो: एआई जनरेटेड
HighLights
दिल्ली के बुजुर्गों को 3°C वृद्धि पर 2,020 घंटे UHS
जून-सितंबर में दिन-रात खतरनाक गर्मी का सामना करना पड़ेगा
भारत में 64.84 करोड़ लोग 180+ घंटे UHS से प्रभावित
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। वैश्विक तापमान में औद्योगिक दौर से पहले के स्तर की तुलना में 3°C की बढ़ोतरी होने पर दिल्ली के बुजुर्गों को साल में करीब 2,020 घंटे ऐसे ताप का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें शरीर गर्मी को पर्याप्त तेजी से बाहर नहीं निकाल पाएगा।
द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक वैश्विक मॉडलिंग अध्ययन में जून से सितंबर के दौरान दिन और रात दोनों समय लंबे समय तक ऐसे खतरनाक हालात बने रहने का अनुमान है।
शरीर के लिए गर्मी से राहत मुश्किल
अध्ययन में इसे अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस (UHS) कहा गया है। यह वह स्थिति है जब शरीर तापीय संतुलन बनाए रखने के लिए पर्याप्त तेजी से गर्मी बाहर नहीं निकाल पाता।
लंबे समय तक ऐसी गर्मी में रहने से हाइपरथर्मिया का खतरा बढ़ सकता है और हृदय, श्वसन तथा किडनी से जुड़ी पुरानी बीमारियां गंभीर हो सकती हैं।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की डॉ. किंकिन कोंग के नेतृत्व में किए गए अध्ययन Exceeding human heat tolerance in a warming, ageing world में दिल्ली के बुजुर्गों के लिए अलग-अलग तापमान वृद्धि पर UHS का अनुमान लगाया गया है।
तापमान बढ़ने पर तेजी से बढ़ेगा UHS
अध्ययन के मुताबिक दिल्ली की बुजुर्ग आबादी को 1.5°C तापमान वृद्धि पर सालाना करीब 880 घंटे, 2°C पर 1,228 घंटे, 3°C पर 2,020 घंटे और 4°C पर 2,726 घंटे UHS का सामना करना पड़ सकता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, पृथ्वी का दीर्घकालिक तापमान औद्योगिक दौर से पहले के स्तर से करीब 1.4°C ऊपर पहुंच चुका है। वर्ष 2024 लगभग 1.5°C अधिक तापमान के साथ अब तक का सबसे गर्म व्यक्तिगत वर्ष रहा।
जून-सितंबर में सबसे ज्यादा खतरा
अध्ययन में कहा गया है कि 3°C तापमान वृद्धि की स्थिति में 2,000 से ज्यादा घंटे का UHS मुख्य रूप से जून से सितंबर के चार महीनों में केंद्रित रहेगा। इन चार महीनों में कुल 2,880 घंटे होते हैं।
डॉ. कोंग के अनुसार, इसका मतलब है कि इस अवधि के अधिकांश समय, दिन और रात दोनों में, तापमान शरीर की गर्मी सहने की क्षमता से बाहर हो सकता है।
अध्ययन में दिल्ली के साथ लाहौर और दुबई को भी उच्च जोखिम वाले शहरों में शामिल किया गया है। 3°C और 4°C तापमान वृद्धि की स्थिति में जून से सितंबर के दौरान दिल्ली में दिन और रात दोनों समय गर्मी के मानव सहनशीलता स्तर पार करने की संभावना 60 प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान है।
बुजुर्गों पर ज्यादा गंभीर असर
इस अध्ययन की खास बात यह है कि इसमें पूरी आबादी के लिए एक ही तापमान सीमा तय करने के बजाय युवा, मध्यम आयु और बुजुर्गों के लिए प्रयोगों से हासिल अलग-अलग गर्मी-सहनशीलता सीमाओं का इस्तेमाल किया गया है।
शोध में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी, पर्ड्यू यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का ओमाहा, टेक्सास हेल्थ प्रेस्बिटेरियन हॉस्पिटल डलास, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर और यूनिवर्सिटी ऑफ जॉर्जिया के शोधकर्ताओं ने योगदान दिया।
आईजीपी में खेती पर भी असर
इंडो-गैंगेटिक प्लेन (IGP) को भी गर्मी, नमी और बड़ी आबादी के कारण प्रमुख वैश्विक हॉटस्पॉट बताया गया है। 1.5°C तापमान वृद्धि पर IGP के कुछ हिस्सों में युवा वयस्कों को सालाना करीब 42 से 84 घंटे UHS झेलना पड़ सकता है।
4°C तापमान वृद्धि पर क्षेत्र के हॉटस्पॉट में यह अवधि युवा वयस्कों के लिए भी 540 घंटे से ज्यादा हो सकती है।
IGP एक बड़ा कृषि क्षेत्र है और मानसून के दौरान पड़ने वाली गर्मी खरीफ की खेती के समय से भी जुड़ती है। अध्ययन के मुताबिक लंबे समय तक गर्मी में खेतों में काम करना मुश्किल या असुरक्षित हो सकता है। रात में तापमान अधिक रहने से भी लोगों को पर्याप्त राहत नहीं मिल सकती।
भारत में 64.84 करोड़ लोग प्रभावित
3°C तापमान वृद्धि की स्थिति में सालाना कम से कम 180 घंटे UHS झेलने वाली आबादी की संख्या भारत में सबसे अधिक होने का अनुमान है।
अध्ययन के अनुसार 64.84 करोड़ लोग, यानी 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की भारत की आबादी का करीब 50.2 प्रतिशत, इस सीमा को पार कर सकता है।
| देश | 180 घंटे से अधिक UHS झेलने वाली अनुमानित आबादी |
|---|---|
| भारत | 64.84 करोड़ |
| चीन | 42.24 करोड़ |
| पाकिस्तान | 29.49 करोड़ |
शहरों में वास्तविक जोखिम और ज्यादा
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि शहरी क्षेत्रों में वास्तविक जोखिम इन अनुमानों से अधिक हो सकता है। इसकी वजह यह है कि जलवायु मॉडल शहरों में बनने वाले अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव को पूरी तरह नहीं पकड़ पाते।
अध्ययन में उद्धृत साक्ष्यों के मुताबिक अनौपचारिक बस्तियों के भीतर तापमान पास के मौसम केंद्रों में दर्ज तापमान से 2°C तक अधिक हो सकता है।
हीट एक्शन प्लान में बदलाव की जरूरत
अध्ययन के निष्कर्षों के मुताबिक भारत की हीट-एक्शन योजनाओं में सिर्फ तापमान के आधार पर चेतावनी देने के बजाय उम्र, नमी, गर्मी की अवधि और रात के तापमान को भी शामिल करने की जरूरत है।
इसके साथ कूलिंग सेंटर, बेहतर वेंटिलेशन, हरित क्षेत्र और खुले में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा जैसे उपायों पर भी जोर दिया गया है।
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