पर्यावरण अपराधों की भी कैपिटल बनी दिल्ली, 91% मुकदमों की सुनवाई पेंडिंग; CSE रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
दिल्ली पर्यावरण अपराधों की राजधानी बन रही है, जहां मुकदमे बढ़ रहे हैं लेकिन जांच और न्यायिक प्रक्रिया की खामियों के कारण दोषियों को सजा कम मिल रही है।

नाली बनाने में लापरवाही के चलते रोहिणी सेक्टर 24 में कटा पड़ा हरा भरा पेड़। जागरण आर्काइव
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली अब पर्यावरण अपराधों की राजधानी भी बनती जा रही है। चिंताजनक यह कि पर्यावरण अपराधों पर लगाम लगाने के लिए मुकदमे तो बढ़ रहे हैं, लेकिन जांच और न्यायिक प्रक्रिया की खामियां दूर करने पर जिम्मेदार एजेंसियों का ध्यान नहीं दिख रहा।
नतीजा यह है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले मामलों में कार्रवाई के बावजूद दोषियों को सजा मिलने की दर कम एवं लंबित मुकदमों का बोझ लगातार बना हुआ है।
पर्यावरण अपराधों में दिल्ली की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत
सेंटर फार साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट ''स्टेट आफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026 : इन फिगर्स'' के मुताबिक केंद्र शासित प्रदेशों में होने वाले कुल पर्यावरण अपराधों में अकेले दिल्ली की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत से भी ज्यादा है।
यहां अवैध रूप से पेड़ काटने, फैक्ट्रियों का केमिकल बहाने, निर्माण स्थलों पर नियमों के खिलाफ धूल उड़ाने, प्रतिबंधित प्लास्टिक या ई-कचरा डंप करने, रात में तेज आवाज में लाउडस्पीकर तथा जनरेटर चलाने के मामले साल दर साल 12 से 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं।
91 प्रतिशत से ज्यादा मामले अदालतों में लंबित
रिपोर्ट में दिए आंकड़ों के अनुसार, हैरानी की बात यह भी कि दिल्ली की अदालतों में पर्यावरण से जुड़े 91 प्रतिशत से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं। यानी कानून तोड़ने वालों पर समय से कार्रवाई ही नहीं हो पाती।
इसके अलावा, ढीली पैरवी और वैज्ञानिक सबूतों की कमी के चलते कोर्ट से सजा होने की दर 18.5 प्रतिशत से भी कम है। इसका सीधा मतलब यह कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले हर पांच में से चार आरोपी साक्ष्यों के अभाव में साफ बच निकलते हैं।
स्टाफ की कमी से कार्रवाई पर असर
पर्यावरणविदों का साफ कहना है कि दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और वन विभाग जैसी सरकारी एजेंसियों में स्टाफ की कमी और स्पेशल कोर्ट में मुकदमों की कछुआ चाल के कारण ही आज राजधानी में पर्यावरण अपराधियों के हौसले बुलंद हैं।
प्रमुख पर्यावरण कानून जिनके तहत मामले
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 : औद्योगिक इकाइयों द्वारा बिना अनुमति प्रदूषण फैलाना या खतरनाक कचरा डंप करना।
- वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 : ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) के नियमों का उल्लंघन करना और निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के नियमों को तोड़ना।
- दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम (डीपीटीए 1994) : राजधानी की हरियाली को अवैध रूप से नुकसान पहुंचाना या बिना वन विभाग की अनुमति के पेड़ काटना।
दिल्ली में पर्यावरण मुकदमों का लेखा-जोखा
| साल 2022 | साल 2023 | साल 2024 |
|---|---|---|
| 226 | 266 | 294 |
अदालतों में मुकदमों की स्थिति
- लंबित केस दर - 91.2 प्रतिशत : अदालतों में पर्यावरण से जुड़े 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों पर समय से सुनवाई पूरी ही नहीं हो पाती और फाइलें दबी रह जाती हैं।
- सजा मिलने की दर - 18.5 प्रतिशत : ढीली तफ्तीश और कानूनी पैरवी कमजोर होने के कारण कोर्ट से सिर्फ 18 प्रतिशत आरोपियों को ही सजा मिल पाती है, बाकी बरी हो जाते हैं।
- चार्जशीट दाखिल होने की दर - 82 प्रतिशत : पुलिस और एजेंसियां मामले पकड़कर 82 प्रतिशत केसों की चार्जशीट तो कोर्ट में दाखिल कर देती हैं, लेकिन इसके बाद अदालती ट्रायल की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है।
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