विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

दिल्ली सरकार लाई Carbon Credit मोनेटाइजेशन नीति, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ग्रीन प्रोजेक्ट्स से की जाएगी कमाई

Published: Thu, 15 Jan 2026 01:31 PM (IST)

दिल्ली सरकार ने वायु प्रदूषण पर जनता के गुस्से के बाद 'कार्बन क्रेडिट मोनेटाइजेशन फ्रेमवर्क' को मंजूरी दी है। इस ...और पढ़ें

दिल्ली सरकार लेकर आई कार्बन क्रेडिट मोनेटाइजेशन पॉलिसी। फोटो (AI जनरेटेड)

दिल्ली सरकार लेकर आई कार्बन क्रेडिट मोनेटाइजेशन पॉलिसी। फोटो (AI जनरेटेड)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। राजधानी में लगातार बिगड़ते वायु प्रदूषण को लेकर जनता के विरोध और नाराजगी के बीच दिल्ली सरकार ने मंगलवार को ‘कार्बन क्रेडिट मोनेटाइजेशन फ्रेमवर्क’ को मंजूरी दे दी।

सरकार का कहना है कि इस नीति के तहत विभिन्न ग्रीन प्रोजेक्ट्स से कार्बन उत्सर्जन में कमी कर जो कार्बन क्रेडिट अर्जित होंगे, उन्हें अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय बाजार में बेचकर राजस्व जुटाया जाएगा। हालांकि सरकार ने फिलहाल इस फ्रेमवर्क को लागू करने की समयसीमा और विस्तृत प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं की है।

Carbon Credit1

क्या होते हैं कार्बन क्रेडिट

कार्बन क्रेडिट का अर्थ है किसी परियोजना के जरिए वातावरण से एक टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को कम करना, बचाना या हटाना। उदाहरण के तौर पर यदि सरकार वृक्षारोपण परियोजना चलाकर 10 टन CO₂ उत्सर्जन घटाती है, तो उसे 10 कार्बन क्रेडिट मिलते हैं।

इन क्रेडिट को वह कार्बन बाजार में किसी ऐसी कंपनी को बेच सकती है, जो अपने उत्सर्जन लक्ष्य पूरे नहीं कर पा रही हो। ऐसी कंपनियां ये क्रेडिट खरीदकर यह दावा कर सकती हैं कि उन्होंने उत्सर्जन लक्ष्य हासिल कर लिया है।

विशेषज्ञाें के अनुसार, डीकार्बोनाइजेशन यानी कार्बन उत्सर्जन कम करना एक महंगी प्रक्रिया है। जैसे डीजल बसों की तुलना में इलेक्ट्रिक बसें खरीदना सरकार के लिए ज्यादा खर्चीला है, लेकिन पर्यावरण के लिए बेहतर है। कार्बन ट्रेडिंग इन महंगे ग्रीन विकल्पों को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाती है।

Carbon Credit2

कैसे काम करता है कार्बन बाजार और क्या है कीमत

कंपनियां या सरकारें अपनी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत या नियमों का पालन करने के लिए स्वेच्छा से कार्बन क्रेडिट खरीद सकती हैं। विश्व बैंक की State and Trends of Carbon Pricing 2025 रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में इस समय करीब 80 कार्बन ट्रेडिंग सिस्टम मौजूद हैं। भारत भी अपना कार्बन बाजार स्थापित करने की प्रक्रिया में है।

इन बाजारों से मान्यता प्राप्त निजी थर्ड पार्टी एजेंसियां कंपनियों और परियोजनाओं के उत्सर्जन में कमी का ऑडिट और सत्यापन करती हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट के मुताबिक एक कार्बन क्रेडिट की कीमत 1 डॉलर से लेकर 100 डॉलर से अधिक तक हो सकती है, जो बाजार की मांग-आपूर्ति पर निर्भर करती है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि 2025 में कार्बन प्राइसिंग वैश्विक उत्सर्जन के 28 प्रतिशत हिस्से को कवर कर चुकी है, जबकि 2005 में यह आंकड़ा केवल 5 प्रतिशत था। अकेले 2025 में ही इससे 100 अरब डॉलर से अधिक का राजस्व जुटाया गया।

दिल्ली सरकार की नीति में क्या होगा

दिल्ली सरकार ने बताया कि इलेक्ट्रिक बसें चलाना, वृक्षारोपण अभियान, सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना और कचरा प्रबंधन जैसे कई सरकारी प्रोजेक्ट्स से कार्बन उत्सर्जन में जो कमी आएगी, उसे वैज्ञानिक तरीके से मापा जाएगा। इसके बाद इन कटौतियों को कार्बन क्रेडिट के रूप में पंजीकृत कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचा जाएगा।

पर्यावरण विभाग के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया के लिए एक विशेष एजेंसी का चयन किया जाएगा, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार डॉक्यूमेंटेशन और रजिस्ट्रेशन का काम संभालेगी। यह मॉडल रेवेन्यू शेयरिंग पर आधारित होगा और सरकार पर कोई अग्रिम खर्च नहीं पड़ेगा। इस नीति से होने वाली पूरी आय राज्य के समेकित कोष (Consolidated Fund of the State) में जमा की जाएगी।

वैभव चतुर्वेदी का कहना है कि दिल्ली इस तरह की नीति को मंजूरी देने वाले राज्यों में अग्रणी है। महाराष्ट्र पहले ही चार-पांच महीने पहले ऐसी नीति लागू कर चुका है। यह तंत्र सरकार को सीधे तौर पर उन गतिविधियों में निवेश के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देता है, जो कार्बन उत्सर्जन कम करने में सहायक हैं।

यह भी पढ़ें- दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर कोहरे के चलते भीषण हादसा, बस-ट्रक टक्कर में दो की मौत; पांच घायल