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सिर्फ तापमान नहीं, जानलेवा उमस भी बढ़ा रही खतरा; ​​क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट ने चौंकाया

Published: Sun, 28 Jun 2026 09:36 AM (IST)

क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट के अनुसार, जानलेवा उमस भरी गर्मी के दिन 1970 के बाद से दोगुने से अधिक हो गए हैं, जिसका मुख्य कारण मानवजनित जलवायु परिवर्तन है।

तेज धूप से बचने के लिए छाता लेकर गुजरती युवतियां।

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HighLights

  1. 1970 के बाद खतरनाक उमस भरे दिन दोगुने से अधिक हुए

  2. मानवजनित जलवायु परिवर्तन 64% जानलेवा उमस भरी गर्मी का कारण

  3. भारत के तटीय, गंगा मैदानों में उमस भरी गर्मी का खतरा बढ़ा

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। जब भी देश में गर्मी का प्रकोप बढ़ता है, तो अमूमन लोगों की जुबान पर एक ही सवाल होता है— 'आज पारा कितने डिग्री पहुंचा? 42 डिग्री या 45 डिग्री?' लेकिन पर्यावरण वैज्ञानिकों की मानें तो असली खतरा सिर्फ तापमान के इन आंकड़ों में नहीं, बल्कि हवा में घुली उस नमी (उमस) में छिपा है जो दिखाई नहीं देती। यही वजह है कि कई बार 38 डिग्री सेल्सियस की उमस भरी दोपहर, 44 डिग्री की सूखी गर्मी से कहीं ज्यादा जानलेवा महसूस होती है।

जलवायु परिवर्तन पर शोध करने वाली संस्था 'क्लाइमेट सेंट्रल' के एक नए और चौंकाने वाले विश्लेषण के मुताबिक, दुनिया भर में ऐसी खतरनाक उमस भरी गर्मी (Humid Heat) तेजी से बढ़ रही है। यह रिपोर्ट भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए एक गंभीर रेड अलर्ट है।

Heatwave (1)

सांकेतिक तस्वीर। सौजन्य- AI Generated

50 सालों में दोगुने से ज्यादा हुए खतरनाक दिन

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि 1970 के दशक में दुनिया भर में औसतन केवल 10 दिन प्रति वर्ष ऐसे होते थे, जब गर्मी और नमी का मिश्रण मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता था। आज यह संख्या दोगुनी से भी अधिक बढ़कर 23 दिन प्रति वर्ष हो चुकी है।

वैज्ञानिकों का निष्कर्ष बेहद चिंताजनक है— 1970 के बाद से दुनिया में दर्ज किए गए लगभग 64% खतरनाक उमस भरे दिनों के पीछे सीधे तौर पर मानवजनित जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है। साल 2025 में तो स्थिति और भयावह दिखी, जहां कुल 23 खतरनाक उमस भरे दिनों में से 19 दिन (लगभग 83%) सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग के कारण थे।

तटीय शहरों से लेकर गंगा के मैदानों तक संकट

भारत के लिए यह खबर इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ की एक बहुत बड़ी आबादी पहले से ही इस दोहरी मार को झेल रही है। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, विशाखापट्टनम और कोच्चि जैसे तटीय शहरों में अक्सर लोग कहते हैं कि 'गर्मी से ज्यादा उमस मारती है।'

अब यही स्थिति मानसून के आगे-पीछे गंगा के मैदानी इलाकों (उत्तर भारत) में भी तेजी से बन रही है, जहां पसीना तो निकलता है लेकिन हवा में भारी नमी के कारण वह सूख नहीं पाता।

क्यों खतरनाक है उमस भरी गर्मी?

वैज्ञानिकों के अनुसार, हमारा शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीना बहाता है। जब पसीना त्वचा से वाष्पित (Evaporate) होता है, तो शरीर का तापमान कम होता है। लेकिन जब हवा में पहले से ही नमी बहुत अधिक हो, तो पसीना सूखने की यह प्रक्रिया बेहद धीमी पड़ जाती है। नतीजा यह होता है कि गर्मी शरीर के भीतर ही फंस जाती है।

इस स्थिति के कारण

निर्जलीकरण (Dehydration) और हीट एग्जॉशन का खतरा बढ़ जाता है। हीट स्ट्रोक, दिल का दौरा और सांस संबंधी बीमारियां जानलेवा हो सकती हैं।

वर्ष 2000 के बाद से दुनिया भर में अत्यधिक गर्मी के कारण ढाई लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इसमें बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं और मजदूर सबसे ज्यादा जोखिम पर हैं।

क्या है 'वेट बल्ब तापमान' की चेतावनी?

इस खतरे की गंभीरता को मापने के लिए वैज्ञानिक 'वेट बल्ब तापमान' (Wet Bulb Temperature) का उपयोग करते हैं, जिसमें तापमान के साथ-साथ हवा की नमी को भी जोड़ा जाता है।

'क्लाइमेट सेंट्रल' ने 25 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक के वेट बल्ब तापमान को 'खतरनाक' श्रेणी में रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के 961 शहरों में से 69% शहरों में जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसे खतरनाक दिनों की संख्या बढ़ी है।

विशेषज्ञों ने क्या कहा?

कैटलिन ट्रूडो (एप्लाइड क्लाइमेट साइंटिस्ट, क्लाइमेट सेंट्रल): 'खतरनाक उमस भरी गर्मी अब कोई दुर्लभ घटना नहीं रह गई है। यह कई जगहों पर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही है और परिस्थितियां मानव शरीर की सहनशक्ति की सीमाओं को पार कर रही हैं।'

डॉ. लिसा पटेल (बाल रोग विशेषज्ञ, स्टैनफोर्ड चिल्ड्रेन्स हेल्थ): 'यह एक बड़ी चेतावनी है। 1970 के दशक की तुलना में यह खतरा दोगुना हो चुका है और इसके घातक असर अब हमारे बच्चों और मरीजों पर साफ दिखाई देने लगे हैं।'

जागरण मत

भारत में जलवायु परिवर्तन पर होने वाली बहस अक्सर केवल तापमान के नए रिकॉर्ड (जैसे 48 या 50 डिग्री) तक सीमित रह जाती है। लेकिन यह रिपोर्ट याद दिलाती है कि असली खतरा उस अदृश्य नमी और पसीने में है जो सूख नहीं पाता। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह उमस भरी गर्मी आने वाले समय में एक बड़ा मानवीय संकट बन सकती है।