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साइबरनाइफ से दिमाग की गांठ और मिर्गी का सटीक इलाज, ऑपरेशन की तकलीफ से मुक्ति

Published: Wed, 16 Sep 2026 10:54 AM (IST)

साइबरनाइफ तकनीक से दिमाग की गांठ और मिर्गी का बिना चीर-फाड़ सटीक इलाज संभव है, जिससे पारंपरिक ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं होती।

साइबर नाइफ से बिना चीर फाड़ ऑपरेशन हो सकता है। फोटो: एआई जनरेटेड

साइबर नाइफ से बिना चीर फाड़ ऑपरेशन हो सकता है। फोटो: एआई जनरेटेड

HighLights

  1. साइबरनाइफ से बिना चीर-फाड़ दिमाग की गांठ का सटीक उपचार

  2. यह तकनीक संवेदनशील ब्रेन ट्यूमर और मिर्गी में उपयोगी

  3. डॉ. आदित्य गुप्ता ने साइबरनाइफ से 2,500 से अधिक उपचार किए

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिमाग में गांठ होने पर हर मरीज को ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं होती है। रेडियोसर्जरी की आधुनिक तकनीक साइबरनाइफ से बिना चीर-फाड़ लक्षित गांठ पर अत्यधिक सटीक रेडिएशन देकर उपचार किया जा सकता है।

खासकर ऐसे ब्रेन ट्यूमर में यह उपयोगी है जो मस्तिष्क के संवेदनशील हिस्सों या महत्वपूर्ण नसों के पास होता और जिनमें पारंपरिक सर्जरी से मरीज को खतरा अधिक होता।

साइबरनाइफ से बिना चीर-फाड़ ब्रेन ट्यूमर का उपचार

यह जानकारी सोमवार को एम्स के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर और न्यूरोसर्जरी एवं सीएनएस रेडियोसर्जरी विशेषज्ञ डाॅ. आदित्य गुप्ता ने दी। उन्होंने बताया कि साइबरनाइफ से ब्रेन ट्यूमर और रीढ़ की जटिल गांठों का सटीक उपचार संभव है।

उन्होंने एम्स में रहते हुए गामा नाइफ से 3,000 से अधिक मरीजों का उपचार किया था। बताया कि वर्तमान में आर्टेमिस अस्पताल गुरुग्राम में साइबरनाइफ से 2,500 से अधिक इस तरह के उपचार वह कर चुके हैं।

अलग-अलग दिशाओं से गांठ पर दिया जाता है रेडिएशन

एक प्रश्न के उत्तर में डाॅ. आदित्य गुप्ता ने बताया कि साइबरनाइफ में शरीर को काटने की आवश्यकता नहीं होती, इसमें लक्षित गांठ पर या शरीर के हिस्से पर अलग-अलग दिशाओं से रेडिएशन दिया जाता है। इससे आसपास के स्वस्थ टिश्यू को नुकसान कम होने में मदद मिलती है।

चुनिंदा मिर्गी मरीजों के लिए भी हो सकता है विकल्प

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि मिर्गी के दवाओं से नियंत्रित न होने वाले कुछ चुनिंदा मामलों में भी यह सर्जरी या रेडियोसर्जरी विकल्प हो सकता है। जांच से यह पता लगाना जरूरी है कि दौरे मस्तिष्क के किस हिस्से से शुरू हो रहे हैं।

सही मरीज का चयन होने पर उपचार से दौरे पूरी तरह रुकने की संभावना भी रहती है। बताया कि अभी इसमें खर्च अधिक हो रहा है क्योंकि अधिकांश इसे आयात करना पड़ता है पर, इसमें स्वदेशी तकनीक भी तेजी से विकसीत हो रही है, तब यह काफी कम हो जाएगा।

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