दिल्ली में अब कार कंपनियों को घटाना होगा प्रदूषण, लागू हुए CAFE-3 मानक; जानें ग्राहकों पर क्या होगा असर?
केंद्र सरकार ने कार कंपनियों के लिए नए CAFE-3 मानक लागू किए हैं, जिनका लक्ष्य 2031-32 तक कारों के औसत ...और पढ़ें

केंद्र सरकार ने कारों के लिए नए काॅरपोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (सीएएफई-3) मानक लागू कर दिए हैं। एआई इमेज
HighLights
CAFE-3 मानक 2027-28 से 2031-32 तक लागू, उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य।
इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड कारों को विशेष क्रेडिट, बढ़ावा मिलेगा।
ग्राहकों को भविष्य में अधिक ईंधन-कुशल वाहन विकल्प मिलेंगे।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। आने वाले वर्षों में कार कंपनियों के लिए ऐसी कारें बनाना जरूरी होगा जो कम ईंधन खाएं और कम प्रदूषण फैलाएं। केंद्र सरकार ने कारों के लिए नए काॅरपोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (सीएएफई-3) मानक लागू कर दिए हैं।
ये नियम वित्त वर्ष 2027-28 से 2031-32 तक लागू रहेंगे। आसान भाषा में समझें तो सरकार चाहती है कि कंपनियों की कारों का औसत कार्बन उत्सर्जन हर साल घटे।
अभी 1,229 किलो वजन वाली कार के लिए औसत उत्सर्जन की सीमा करीब 94.8 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड प्रति किलोमीटर है। 2031-32 तक इसे घटाकर करीब 78.9 ग्राम करना होगा। यानी पांच साल में प्रति किलोमीटर उत्सर्जन में करीब 17 प्रतिशत कमी लानी होगी।
ईवी और हाइब्रिड कारों को फायदा
नए नियमों में इलेक्ट्रिक और कम प्रदूषण करने वाली कारों को बढ़ावा देने के लिए कंपनियों को अतिरिक्त क्रेडिट मिलेगा। बैटरी वाली इलेक्ट्रिक कारों और रेंज बढ़ाने वाली इलेक्ट्रिक कारों को सबसे ज्यादा 3 गुना क्रेडिट मिलेगा। प्लग-इन हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल हाइब्रिड को 2.5 गुना तथा स्ट्रांग हाइब्रिड को 1.6 गुना क्रेडिट मिलेगा। इसका फायदा यह होगा कि कंपनियां अपने पूरे कार पोर्टफोलियो का औसत उत्सर्जन तय सीमा के भीतर रख सकेंगी।
E20 और सीएनजी को भी प्रोत्साहन
पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल यानी E20 इस्तेमाल करने वाली कारों को भी उत्सर्जन में 8 प्रतिशत की छूट मिलेगी। फ्लेक्स-फ्यूल कारों को 22.3 प्रतिशत और सीएनजी कारों को कम से कम 5 प्रतिशत की छूट मिलेगी। कंपनियां कारों में ऊर्जा बचाने वाली तकनीकों का इस्तेमाल कर अधिकतम 9 ग्राम सीओटू प्रति किलोमीटर तक की अतिरिक्त छूट भी हासिल कर सकेंगी। हालांकि आगे चलकर इन दावों की परीक्षण के जरिये जांच होगी।
लक्ष्य पूरा नहीं किया तो क्रेडिट खरीदना होगा
अगर किसी कंपनी की कारों का औसत उत्सर्जन तय सीमा से ज्यादा रहा तो वह दूसरी कंपनियों से क्रेडिट खरीद सकती है। जरूरत पड़ने पर भारतीय ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) से भी क्रेडिट खरीदा जा सकेगा, जिसकी कीमत 2,500 से 4,500 रुपये प्रति ग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड/किमी होगी।
हालांकि, सबसे बड़ा सवाल ईवी को लेकर है। सरकार ने अगले पांच वर्षों में कारों में करीब 12 प्रतिशत विद्युतीकरण का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य उस समय बड़ा माना जाता, जब ईवी की बिक्री करीब तीन प्रतिशत थी। लेकिन अब कई महीनों से कार बिक्री में ईवी की हिस्सेदारी करीब 8 प्रतिशत पहुंच चुकी है। ऐसे में 2032 तक केवल 12 प्रतिशत का लक्ष्य मौजूदा रफ्तार की तुलना में बहुत महत्वाकांक्षी नहीं दिखता।
ग्राहक के लिए क्या बदलेगा?
- ईवी और हाइब्रिड कारों को बढ़ावा मिलेगा : नए नियमों के कारण कंपनियों पर कम प्रदूषण वाली कारें बनाने का दबाव बढ़ेगा। इसलिए आने वाले वर्षों में बाजार में ईवी, हाइब्रिड और ज्यादा माइलेज वाली कारों के विकल्प बढ़ सकते हैं।
- पेट्रोल कारें भी ज्यादा किफायती : कंपनियों को कारों की ईंधन दक्षता बढ़ानी होगी। इसका मतलब है कि नई पेट्रोल कारें पहले के मुकाबले बेहतर माइलेज देने वाली तकनीक के साथ आ सकती हैं। इससे लंबे समय में ग्राहकों का ईंधन खर्च कम हो सकता है।
- कारों की कीमत पर असर संभव : नई तकनीक, हाइब्रिड सिस्टम और ऊर्जा दक्षता वाली तकनीकों की लागत अधिक होती है। इसका कुछ हिस्सा कंपनियां कार की कीमत में जोड़ सकती हैं। यानी कुछ मॉडलों की शुरुआती कीमत बढ़ने की संभावना है।
- ईवी खरीदने वालों को ज्यादा विकल्प मिलेंगे : कंपनियों को उत्सर्जन लक्ष्य पूरा करने के लिए ज्यादा ईवी बेचने की जरूरत होगी। इससे आने वाले वर्षों में अलग-अलग कीमत और श्रेणी में ईवी के विकल्प बढ़ सकते हैं।
- प्रदूषण कम करने का फायदा सभी को : इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सड़कों पर चलने वाली नई कारों से औसतन कम कार्बन उत्सर्जन होगा। यानी नियमों का असर सिर्फ कार खरीदने वाले पर नहीं, बल्कि शहरों के प्रदूषण और पर्यावरण पर भी पड़ेगा।
नए सीएएफई नियमों का सीधा मतलब है कि आने वाले वर्षों में ग्राहक को ऐसी कारें ज्यादा मिलेंगी जो कम ईंधन खाएं और कम प्रदूषण करें। हालांकि, इन नई तकनीकों की लागत का कुछ असर कार की कीमत पर पड़ सकता है।
ईवी को लेकर उठ रहे सवाल
सीएएफई-3 में अगले पांच वर्षों में करीब 12 प्रतिशत ईवी हिस्सेदारी का अनुमान है। वहीं, आईसीसीटी के भारत प्रबंध निदेशक अमित भट्ट के मुताबिक, कंपनियों की मौजूदा घोषणाओं और नियामकीय दस्तावेजों में 2030 तक संयुक्त ईवी बिक्री की प्रतिबद्धता करीब 20 प्रतिशत बैठती है। उनका कहना है कि अंतिम सीएएफई मानकों को करीब 12 प्रतिशत ईवी हिस्सेदारी के साथ भी पूरा किया जा सकता है।
कमजोर पड़ सकता है उद्देश्य
भट्ट के मुताबिक, नियमों में कंपनियों को लक्ष्य हासिल करने के कई रास्ते दिए गए हैं। इससे वे मौजूदा तकनीकों के सहारे भी मानक पूरा कर सकती हैं। उनका मानना है कि सुपर क्रेडिट जैसी व्यवस्था नई तकनीकों को शुरुआती दौर में बढ़ाने में उपयोगी है, लेकिन स्थापित तकनीकों को समान लाभ देने से इसका उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों को अब भी है शंका
पूर्व जी20 शेरपा अमिताभ कांत ने भी इसी मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा है, 'सीएएफई एक चूका हुआ अवसर है, क्योंकि इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि हमें विद्युतीकरण की दिशा में बढ़ना ही है।'
यानी नए मानक कारों के प्रदूषण को कम करने का दबाव तो बढ़ाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक यह अभी स्पष्ट नहीं है कि उद्योग को तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर ले जाने के लिए ये नियम पर्याप्त दबाव पैदा करेंगे या नहीं।
