सिर्फ यौन इच्छा नहीं, मानसिक विकृति और नफरत का नतीजा हैं सेक्सुअल क्राइम; AIIMS स्टडी का बड़ा खुलासा
यौन अपराध केवल यौन इच्छा या मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि गुस्सा, शत्रुता और विकृत सोच जैसे कई मनोसामाजिक कारकों का परिणाम हैं।
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प्रो. डॉ. निमेष जी देसाई और प्रो. डॉ. राजेश सागर। जागरण
HighLights
यौन अपराधों में गुस्सा, शत्रुता, विकृत सोच की भूमिका।
बचपन के प्रतिकूल अनुभव यौन हिंसा से जुड़े होते हैं।
सहमति, सम्मान और प्रभावी न्याय प्रणाली महत्वपूर्ण हैं।
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। यौन अपराध को केवल यौन इच्छा या मानसिक बीमारी से जोड़कर देखना सही नहीं है।
मनोचिकित्सकों के अनुसार, कुछ मामलों में गुस्सा, शत्रुता, सहानुभूति की कमी, विकृत सोच, आवेग पर नियंत्रण न होना और महिला पर अधिकार जताने की मानसिकता मिलकर यौन हिंसा का रास्ता तैयार कर सकते हैं।
आस्था कुंज सामूहिक दुष्कर्म मामले के बाद अपराध के पीछे के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा के बीच विशेषज्ञों ने कहा कि हर आरोपी की मानसिक और सामाजिक पृष्ठभूमि अलग होती है।
बचपन के अनुभवों का भी पड़ सकता है असर
एम्स नई दिल्ली के मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेश सागर ने यौन अपराध के आरोपी 40 पुरुषों के मनोसामाजिक पहलुओं का अध्ययन किया गया था। इनमें करीब 75 प्रतिशत ने बचपन में कम से कम एक प्रतिकूल अनुभव होने की बात बताई। अध्ययन में आरोपियों में गुस्सा और शत्रुता का स्तर अधिक पाया गया। साथ ही दूसरे व्यक्ति का नजरिया समझने और सहानुभूति से जुड़े पहलुओं का भी आकलन किया गया।
डॉ. राजेश सागर ने अध्ययन के हवाले से बताया कि बचपन के प्रतिकूल अनुभव, आक्रामकता और मनोविकृति संबंधी लक्षणों को यौन हिंसा की रोकथाम और दोबारा अपराध रोकने के प्रयासों में समझना जरूरी है।

दूसरे की भावनाएं समझने में कमी भी अहम
विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्य संबंधों में निकटता धीरे-धीरे विश्वास और स्नेह के साथ विकसित होती है, लेकिन यौन अपराध करने वाले कुछ लोगों में संबंधों को देखने का नजरिया अलग हो सकता है। वे सामने वाले की इच्छा और सीमाओं को महत्व नहीं देते तथा बल प्रयोग को भी सामान्य मानने लगते हैं।
वहीं, ऐसे मामलों में गुस्सा और शत्रुता स्थिति को और हिंसक बना सकती है। हालांकि शोध के निष्कर्ष किसी व्यक्ति के अपराध का एकमात्र कारण निर्धारित नहीं करते।
सोशल मीडिया भी बदल रहे हैं सामाजिक व्यवहार
मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) के पूर्व निदेशक डॉ. निमेष जी देसाई के अनुसार, तेजी से शहरीकरण, गांव से शहर की ओर पलायन, यौन कुंठा, कानून का भय कम होना और सोशल मीडिया का प्रभाव कुछ पुरुषों में अपराध की ओर जाने वाले कारकों में शामिल हो सकते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इनमें से कोई भी कारक अपराध को उचित नहीं ठहरा सकता। यौन इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन उसे सामाजिक और नैतिक रूप से उचित तरीके से नियंत्रित करना सीखना जरूरी है।
डॉ. देसाई के अनुसार, पुरुषों को सहमति, सीमाओं और महिलाओं के सम्मान के बारे में शिक्षित करना और तेज और समान आपराधिक न्याय व्यवस्था सुनिश्चित करना अपराध की रोकथाम में महत्वपूर्ण है।

दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा पर बनी एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में भी शहरी पलायन, महिलाओं की बदलती सार्वजनिक भूमिका को न समझ पाने और महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा व व्यवहार को हिंसक माहौल से जोड़ा गया था।
हर यौन अपराधी मानसिक रोगी नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार, मानसिक बीमारी कुछ मामलों में मौजूद हो सकती है, लेकिन हर यौन अपराध को मानसिक बीमारी का परिणाम मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
एम्स के शोध में भी यौन अपराध के पीछे कई परस्पर जुड़े मनोसामाजिक कारकों को समझने की आवश्यकता बताई गई है। इसलिए अपराध की रोकथाम में मानसिक स्वास्थ्य, बचपन के प्रतिकूल अनुभव, गुस्से पर नियंत्रण, सहानुभूति, स्वस्थ संबंधों की समझ और कानून के प्रभावी भय सभी पहलुओं पर काम करना आवश्यक है।
