नंगे पैर लड़ी लड़ाई, जीत के बाद पहनी चप्पल... DUSU चुनाव में कंडक्टर के बेटे का कमाल
दीपांशु शौकीन ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव में उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की। ...और पढ़ें

दीपांशु शौकीन ने 14 दिन बाद पूरी की कसम, जीतने के बाद पहनी चप्पल।
HighLights
दीपांशु शौकीन ने डूसू उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय जीत हासिल की।
छात्र सुरक्षा के लिए नंगे पैर प्रचार करने का संकल्प पूरा किया।
कंडक्टर के बेटे दीपांशु ने माता-पिता को गौरवान्वित किया।
लोकेश शर्मा, नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव में उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय के रूप में जीत दर्ज करने वाले दीपांशु शौकीन की कहानी सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है।
उनकी जीत के पीछे एक ऐसा संकल्प भी है, जिसने पूरे चुनाव अभियान के दौरान उन्हें सबसे अलग पहचान दी। सत्य निकेतन हादसे में छात्रों की सुरक्षा को लेकर उन्होंने प्रण लिया था कि जब तक वह छात्रों की आवाज नहीं बन जाते, तब तक पैरों में चप्पल नहीं पहनेंगे।
इसके बाद वह पूरे चुनाव प्रचार के दौरान 14 दिन तक नंगे पैर ही छात्रों के बीच पहुंचे। शनिवार को आखिरकार उनका संकल्प पूरा हुआ और उन्होंने पैरों में चप्पल डाल ली।

माता-पिता को बेटे पर गर्व
इसके साथ उन्होंने दिल्ली परिवहन निगम में बस कंडक्टर पिता राकेश शौकीन और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मां को भी गौरवान्वित कर दिया।
पश्चिमी दिल्ली के पीरागढ़ी गांव के रहने वाले दीपांशु के लिए यह संकल्प महज चुनावी रणनीति नहीं था। हादसे के बाद छात्रों की सुरक्षा और छात्रावास की समस्याओं को लेकर वह लगातार आवाज उठाते रहे।
उनका कहना था कि जिस विश्वविद्यालय में देशभर से विद्यार्थी पढ़ने आते हैं, वहां उनके रहने और पढ़ने की सुरक्षित व्यवस्था सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी मुद्दे को उन्होंने अपने चुनाव अभियान का प्रमुख आधार बनाया।
दीपांशु के इस फैसले से उनके माता-पिता भी भावुक हो गए थे। शुरुआत में बेटे की परेशानी देखकर माता-पिता चिंतित हुए, लेकिन बाद में उन्होंने उसके संकल्प और छात्र हित के लिए समर्पित सोच का साथ देना शुरू कर दिया।

कैसा भी रहा सफर दीपांशु ने नहीं पहनी चप्पल
चुनाव प्रचार के दौरान धूप हो या लंबा पैदल चलना, दीपांशु ने चप्पल नहीं पहनी। छात्रों के बीच जाते समय उनके नंगे पैर ही उनके संकल्प की पहचान बन गए।
उन्होंने छात्रों से कहा कि यह केवल उनके पैरों का सवाल नहीं है, बल्कि उन विद्यार्थियों की सुरक्षा और सम्मान का सवाल है जो बेहतर सुविधाओं की उम्मीद लेकर विश्वविद्यालय आते हैं।
एनएसयूआई से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे दीपांशु ने एबीवीपी के इशू मौर्य को 13,705 वोट के अंतर से हराया। उन्हें 30,615 वोट मिले। परिणाम आने के बाद उनकी जीत ने उनके उस संकल्प को भी नया अर्थ दिया।
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दीपांशु ने कहा कि यह जीत सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उन छात्रों की है जो विश्वविद्यालय में सुरक्षित छात्रावास, बेहतर सुविधाएं और अपनी समस्याओं की आवाज चाहते हैं। अब देखना होगा कि चुनाव अभियान में नंगे पैर चलकर जिस छात्र आवाज का संकल्प उन्होंने लिया था, उसे उपाध्यक्ष के पद पर किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
