राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली

देश में मधुमेह की बीमारी बढ़ रही है लेकिन उसे संतुलित जीवनशैली व दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है। बीमारी से ज्यादा चिंता की बात यह है कि डॉक्टर पहले से मौजूद मधुमेह की किफायती दवाओं व इंसुलिन की जगह नए ब्रांड की महंगी दवाएं व इंसुलिन लिखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। इस वजह से मरीजों पर मधुमेह से ज्यादा महंगी दवाओं की मार पड़ रही है, जबकि दवा कंपनियां मालामाल हो रही हैं। फोर्टिस अस्पताल व नेशनल डायबिटीज ओबेसिटी एंड कोलेस्ट्रोल फाउंडेशन द्वारा 20 ब्रांड की दवा कंपनियों पर किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई कि नौ सालों में इंसुलिन का कारोबार 557.61 फीसद (साढ़े पांच गुना) बढ़ा है। मधुमेह की खाई जाने वाली दवाओं (टेबलेट) की बिक्री भी बहुत बढ़ी है। इसका बड़ा कारण महंगे ब्रांड की दवाएं लिखना है।

अध्ययन के दौरान डॉक्टरों ने इंडियन ओरिजिन केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स लिमिटेड के फार्मा डेटा प्लेटफार्म से आंकड़े जुटाए। इसमें देश के 60,000 दवा वितरक व सात लाख खुदरा दवा विक्रेता शामिल हैं। अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2008 में 151.2 करोड़ की इंसुलिन की बिक्री हुई थी जो वर्ष 2012 में 40 फीसद वृद्धि के साथ 218.7 करोड़ हो गया। इस अवधि में इंसुलिन की बिक्री बढ़ने का कारण मधुमेह के मरीजों की संख्या बढ़ने, मरीजों व डॉक्टरों में इंसुलिन के प्रति रूझान बढ़ने व दवा कंपनियों की प्रचार प्रसार माना गया। वर्ष 2012 के बाद नई दवाओं व नए ब्रांड की इंसुलिन का कारोबार अधिक तेजी से बढ़ा। वर्ष 2012 से वर्ष 2014 के बीच इंसुलिन की बिक्री में 114 फीसद की बढ़ोतरी हुई। इसलिए वर्ष 2014 में 467.8 करोड़ की इंसुलिन बिकी। वर्ष 2016 में इंसुलिन का कारोबार 842 करोड़ पहुंच गया। क्योंकि इस दौरान दवा कंपनियों ने नए ब्रांड की इंसुलिन की जमकर मार्केटिंग की। इसलिए डॉक्टरों ने सस्ती इंसुलिन की जगह अधिक कीमत की इंसुलिन लिखना शुरू कर दिया, जबकि नए व पुराने ब्रांड की इंसुलिन में खास फर्क नहीं है। महंगी दवाएं लिखने के कारण इनकी बिक्री चार सालों में 278.5 करोड़ से बढ़कर 700 करोड़ की हो गई।

फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. अनूप मिश्रा ने कहा कि नए ब्रांड की इंसुलिन व नई दवाएं तीन से चार गुना महंगी हैं, क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियां उन्हें बना रही हैं, जो महंगी कीमत पर बेच रहीं हैं। डॉक्टर नई दवाएं व नए ब्रांड की इंसुलिन अधिक लिख रहे हैं। इस तरह मधुमेह की दवाओं व इंसुलिन का गलत इस्तेमाल बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि पुरानी दवाएं व पुराने ब्रांड की इंसुलिन उतना ही प्रभावी हैं। इसलिए सभी मरीजों को नई दवाएं व नए ब्रांड की इंसुलिन लिखने की जरूरत नहीं है। वर्तमान समय में सभी सरकारी प्राथमिक सेंटरों में मधुमेह की सस्ती दवाएं उपलब्ध नहीं होती। सरकार सभी प्राथमिक सेंटरों में सस्ती दवाएं उपलब्ध कराएं। साथ ही डॉक्टरों को भी जागरूक करने की जरूरत है। ताकि वे सही दवा लिख सकें।

इंसुलिन बिक्री रुपये करोड़ में व बढ़ोतरी फीसद में

वर्ष बिक्री बढ़ोतरी

2008- 151.2 -

2012 218.7 40

2014 467.8 114

2016 842 80

मधुमेह की खाने वाली दवाओं (टेबलेट) की बिक्री रुपये करोड़ में व बढ़ोतरी फीसद में

वर्ष कमाई बढ़ोतरी

2013 278.5 -

2015 570.9 105

2016 700 23

नोट: आंकड़े 20 ब्रांड की दवा कंपनियों के हैं।

Posted By: Jagran