नवीन गौतम, बाहरी दिल्ली

दिल्ली की सबसे पुरानी संस्कृत पाठशालाओं में शुमार कराला का श्री राम ऋषि संस्कृत महाविद्यालय संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए एक सदी से प्रयासरत है। जौहरी की इस पाठशाला में संस्कृत के ऐसे नगीने तैयार किए जा रहे हैं, जो न केवल देश बल्कि दुनिया भर में संस्कृत का डंका बजा रहे हैं। इन नगीनों को तराशने का काम इस पाठशाला में नि:शुल्क होता है। महाविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों को नि:शुल्क शिक्षा तथा आवास का प्रावधान है। छात्रों को दैनिक सात्विक भोजन परोसा जाता है, चाय यहां पूरी तरह से प्रतिबंधित है। दिल्ली के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में आयोजित होने वाले धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों में छात्रों द्वारा हवन पाठ पूजा इत्यादि कार्य हेतु छात्रों द्वारा निशुल्क सेवाएं दी जाती हैं।

कराला गांव निवासी लाला जौहरी मल जो अपने समय के धन कुबेर माने जाते थे, उन्होंने वसंत पंचमी के दिन पांच फरवरी 1905 को श्री राम ऋषि संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की थी। 112 वर्ष पुराना यह महाविद्यालय कराला गांव की जमीन पर कंझावला मुख्य मार्ग पर स्थित है। लाला जौहरी मल ने अपनी चल-अचल संपत्ति महाविद्यालय के नाम समर्पित कर इसके संचालन के लिए समिति का गठन किया। वर्ष 1935 में लाला जौहरी मल की आकस्मिक मृत्यु होने पर परिजनों ने उनकी मुहिम को आगे बढ़ाया। वर्तमान में लाला जानकी दास गुप्ता की देखरेख में इस महाविद्यालय में संस्कृत के नगीने तराशे जा रहे हैं।

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मिलता है रोजगार भी

समिति के व्यवस्थापक पं. रोहित शास्त्री जो स्वयं इस महाविद्यालय से संस्कृत में स्नातक हैं, उनके अनुसार भारत सरकार के संस्कृत पाठ्यक्रम के अनुसार कक्षा नौ से स्नातक तक की शिक्षा दी जाती है। यहां देश के कोने-कोने से सामान्य परिवार के छात्र संस्कृत की शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। उन्हें शास्त्री की उपाधि प्रदान की जाती है, जिसके पश्चात वह धार्मिक संस्थाओं, कार्यक्रमों व अन्य धार्मिक उत्सवों में यज्ञोपवीत संस्कार के माध्यम से पूजा-पाठ कर अपने जीवनयापन हेतु पारितोषिक ग्रहण करते हैं। सरकारी व गैर सरकारी शिक्षण संस्थानों में भी शास्त्री शिक्षक के रूप में नियुक्ति होती है।

राजनीति और राजनेताओं से रहती दूरी

प्रति वर्ष वसंत पंचमी के दिन वार्षिक उत्सव का आयोजन किया जाता है। समारोह में हिस्सा लेने हेतु सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं सहित स्थानीय निवासियों को आमंत्रित किया जाता है, लेकिन राजनीति और राजनेताओं से यह कार्यक्रम दूर ही रखा जाता है। अन्य विद्यालयों के छात्रों को भी आमंत्रित किया जाता है। इस कार्यक्रम के आयोजन में दिल्ली संस्कृत अकादमी की अहम भूमिका होती है। यहां से उत्तीर्ण छात्रों को दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है, जिसमें देश और दुनिया के विद्वान शामिल होते हैं।

Posted By: Jagran