संजीव गुप्ता, नई दिल्ली

ब्रिटिश हुकूमत ने देश को आर्थिक ही नहीं, पर्यावरण की दृष्टि से भी खासा नुकसान पहुंचाया है। दिल्ली-एनसीआर तो यह नुकसान आज तक उठा रहा है। अंग्रेजों के लगाए विलायती कीकर ना सिर्फ जहरीला रसायन छोड़ दूसरे पेड़ पौधों को पनपने से रोक रहे हैं बल्कि भूजल को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक जंगल का क्षेत्र बढ़ाने के लिए अंग्रेज कीकर का पेड़ मैक्सिको से लाए थे। इसीलिए इसको विलायती कीकर कहा जाता है। चूंकि इस पेड़ को बढ़ने के लिए सींचने की जरूरत नहीं होती और इसकी जड़ भी बहुत सख्त होती है, इसलिए इसका दायरा भी स्वत: बढ़ता जाता है। दिल्ली में रिज क्षेत्र लगभग 7,777 हेक्टेयर में फैला है। इसमें से 60 फीसद क्षेत्र में विलायती कीकर ही उगा है।

जानकारों के मुताबिक कीकर का पेड़ इलेलोपैथी नाम का रसायन छोड़ता है। यह रसायन इसके आसपास किसी अन्य वनस्पति के पेड़-पौधे को पनपने ही नहीं देता। इस रसायन की वजह से ही जमीन की उर्वरक क्षमता भी प्रभावित होती है और भूजल का स्तर भी नीचे चला जाता है। यह ऑक्सीजन भी नाममात्र की ही छोड़ता है। बहुत से जानकार तो यह भी कहते हैं कि कीकर कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है।

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विलायती कीकर ने अंग्रेजी की आंखों को लुभाने वाले जंगल तो खडे़ कर दिए मगर पर्यावरण पर उनका नकारात्मक प्रभाव आज तक पड़ रहा है। यह वृक्ष किसी भी दृष्टि से उपयोगी नहीं है। इसके पत्ते तक इतने छोटे होते हैं कि इंसान तो क्या, पशु-पक्षियों को भी छाया नहीं दे सकते। नीम का तो आयुर्वेद में भी खासा उपयोग होता है जबकि इसका औषधीय दृष्टि से भी कोई उपयोग नहीं है।

-फैयाज ए खुदसर, पर्यावरणविद।

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यह सही है कि रिज क्षेत्र में कीकर के काफी पेड़ हैं। लेकिन इन्हें वन विभाग ने कभी नहीं लगाया। चूंकि अलग- अलग रिज क्षेत्र अलग-अलग सरकारी विभागों मसलन-डीडीए (दिल्ली विकास प्राधिकरण), सीपीडब्ल्यूडी (केंद्रीय लोक निर्माण विभाग) और पीडब्ल्यूडी (लोक निर्माण विभाग) के अधीन है, इसीलिए इनको हटाने या खत्म करने की दिशा में भी सुनियोजित ढंग से कभी काम नहीं हुआ।

-तरूण जौहरी, वन संरक्षक, वन एवं वन्यजीव विभाग, दिल्ली सरकार।

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