जागरण संवाददाता, पश्चिमी दिल्ली : बहुमंजिली इमारतों से भरी उपनगरी द्वारका में कुओं का दिखना किसी आश्चर्य से कम नहीं। उपनगरी के विभिन्न हिस्सों में एक नहीं, बल्कि दर्जनों कुएं दिखाई देते हैं। कहीं भी कुओं की दशा संतोषजनक दिखाई नहीं देती। सरकार यदि चाहे द्वारका में जहां धरती पानी के लिए कराहती दिखती है, वहां इन कुओं का उपयोग जल संरक्षण के लिए किया जा सकता है।

सेक्टर 6, सेक्टर 11, सेक्टर 15, सेक्टर 22, सेक्टर 17, सेक्टर 19 ये कुछ ऐसे इलाके हैं जहां कुओं को अभी भी देखा जा सकता है। सेक्टर 6, 11 व 17 में तो ये कुएं आवासीय सोसायटी के अंदर स्थित हैं। हालांकि इनमें से केवल सेक्टर 17 ई स्थित पीपल अपार्टमेंट का कुआं ही अच्छी हालत में है। इसका श्रेय डीडीए के साथ आरडब्ल्यूए को भी जाता है। यहां के छतों पर इकट्ठा होने वाले पानी को पाइप के माध्यम से इकट्ठा कर इसका कनेक्शन कुआं से कर दिया गया है। इससे बरसाती पानी कुएं में इकट्ठा होता है और जमीन को रिचार्ज करने का कार्य करता है, लेकिन यह सौभाग्य द्वारका के अन्य कुओं को नहीं मिल रहा। अन्य कुएं संरक्षण की बाट जोहते दिखते हैं। कहीं-कहीं तो कुओं को मलबा या मिट्टियों से आधा या पूरा भर दिया गया है। सेक्टर 15, अंबरहाई व सेक्टर-22 में ऐसे कुएं देखे जा सकते हैं।

भावी पीढ़ी के लिए विरासत

द्वारका के विभिन्न क्षेत्रों में दो से तीन दर्जन कुएं हैं। आने वाली पीढि़यों के लिए ये विरासत के समान हैं। महानगरीय जीवन में अब कुओं के लिए कहीं कोई स्थान नहीं बचा है। ऐसे में डीडीए को इन्हें बचाने के बारे में सोचना होगा। जो कुएं हैं उन्हें आसपास की बरसाती नालियों से जोड़ा जाए तो ये वाटर हार्वेस्टिंग के बेहतर विकल्प बन सकते हैं। इसके अलावा बारिश के मौसम में कच्चे कुएं भी बनाने चाहिए।

दीवान सिंह

सदस्य, जोहड़ संरक्षण समिति

कुआं बेहतर विकल्प

रेन हार्वेस्टिंग के नजरिये से देखें तो कुएं हमारे लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि द्वारका में ये आसानी से उपलब्ध हैं। सिर्फ इन कुओं को साफ करने व बरसाती नालियों से जोड़ने भर की जरूरत है। कुओं को पुनर्जीवित करने से आसपास का भूजल स्तर उठेगा, साथ ही खारापन दूर होने में मदद मिलेगी।

अरविंद रुद्रा

पर्यावरण विशेषज्ञ

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