अभिषेक त्रिपाठी, मैनचेस्टर। सुनील गावस्कर का युग हो या सचिन तेंदुलकर का दौर, भारतीय क्रिकेट की पहचान हमेशा से ही उसका मजबूत बल्लेबाजी क्रम रहा है। मौजूदा समय में विराट कोहली बल्लेबाजी में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। बात यदि गेंदबाजी की होती भी थी तो हमारी ताकत हमेशा ही स्पिनर माने जाते थे। आज भी हमारे पास विश्व कप टीम में कुलदीप यादव, युजवेंद्रा सिंह चहल और रवींद्र जडेजा जैसे विश्व स्तरीय स्पिनर शामिल हैं। इन सबके बावजूद मौजूदा विश्व कप में भारतीय टीम की सबसे बड़ी ताकत बन कर उभरे हैं तेज गेंदबाज। जसप्रीत बुमराह हों, भुवनेश्वर हों या फिर मुहम्मद शमी, इस विश्व कप में किसी भी टीम के बल्लेबाजों के लिए इन्हें खेलना किसी चुनौती से कम नहीं रहा।

भुवनेश्वर के चोटिल होने के बाद माना जा रहा था कि भारतीय तेज गेंदबाजी आक्रमण कमजोर पड़ जाएगा, लेकिन शमी ने उनकी जगह लेते हुए हमारे आक्रमण की धार को और ज्यादा पैनापन दे दिया। इसमें कोई शक नहीं कि इस समय भारतीय टीम का मध्य क्रम सबसे कमजोर कड़ी बना हुआ है, लेकिन तेज गेंदबाजों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए उसकी भरपाई करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। इन तेज गेंदबाजों का प्रदर्शन ही यह विश्वास जगाने में सफल हुआ है कि हम 1983 और 2011 के बाद एक बार फिर विश्व कप अपने नाम करने में सफल हो सकते हैं।

छोटे लक्ष्य का किया बचाव : भारतीय तेज गेंदबाजों की सफलता तब और ज्यादा निखर कर सामने आई जब टीम इंडिया का बल्लेबाजी क्रम अफगानिस्तान और वेस्टइंडीज के खिलाफ बिखरा सा दिखा। अफगानिस्तान के खिलाफ टीम 224 रन ही बना सकी, तो वेस्टइंडीज के खिलाफ 268 तक ही पहुंच पाए। ऐसे में समय में तेज गेंदबाजों का वापसी कराना वह अहसास है जिसकी भारतीय क्रिकेट इतिहास में शायद ही कभी पहले चर्चा की जाती हो। यह भारतीय तेज गेंदबाजी की सफलता को ही दर्शाता है कि वनडे क्रिकेट की विश्व रैंकिंग में नंबर एक पर बुमराह काबिज हैं।

सतर्कता भी जरूरी : भारतीय टीम के तेज गेंदबाजों ने 2003 और 2015 के विश्व कप में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए खिताब की उम्मीद जगाई थी। लेकिन, 2003 में फाइनल में और 2015 में सेमीफाइनल में भारतीय टीम को उसके तेज गेंदबाजों ने ही निराशाजनक प्रदर्शन कर झटका दिया था। इतिहास से सबक लेते हुए इस बार हमारे तेज गेंदबाजों को सतर्क रहना भी जरूरी होगा, क्योंकि उनकी एक भी गलती, खासतौर से सेमीफाइनल और फाइनल में, भारत को फिर से खिताब से दूर धकेल सकती है। बेशक, भारतीय टीम अभी तक विश्व कप में अजेय रही है, लेकिन उसे यह भी अच्छी तरह से याद रखना चाहिए कि पिछले विश्व कप में भी वह सेमीफाइनल से पहले अजेय थी और गेंदबाजों के एक दिन के खराब प्रदर्शन के दम पर वह टूर्नामेंट से बाहर हो गई थी।

2015 के जैसा सफर : ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड की मेजबानी में हुए 2015 के पिछले विश्व कप में भारतीय टीम शुरुआती सात मैचों तक अजेय थी। उमेश यादव, शमी और मोहित शर्मा की तेज गेंदबाजों की तिकड़ी के दमदार प्रदर्शन की वजह से ही यह मुमकिन हो पाया था। तीनों ने मिलकर पूरे टूर्नामेंट में कुल 48 विकेट चटकाए थे।

सेमीफाइनल में भारतीय तेज गेंदबाजों का दिन खराब रहा, जिससे ऑस्ट्रेलिया ने 50 ओवर में सात विकेट पर 328 रन का स्कोर बनाया। भारतीय बल्लेबाजी इस अहम मुकाबले में चरमरा गई और 233 रनों पर पवेलियन लौट गई। पूरे टूर्नामेंट में तेज गेंदबाजों का एक दिन खराब रहा और भारतीय टीम का लगातार दूसरी बार विश्व कप जीतने का सपना अधूरा रह गया था। ऐसे ही हालात इस बार भी हैं। भारतीय टीम छह मैचों में अजेय है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय टीम अगले तीन मुकाबले भी जीत जाए और सबसे ज्यादा अंक लेकर सेमीफाइनल में प्रवेश करे। भारतीय तेज गेंदबाजों की चौतरफा तारीफ हो रही है। विश्व कप में भारतीय गेंदबाजों ने अब तक कुल 34 विकेट झटके हैं और इनमें से 20 विकेट तो बुमराह, भुवनेश्वर और शमी मिलकर ले चुके हैं। आने वाले तीन लीग मैचों में यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है, लेकिन सेमीफाइनल जैसे महत्वपूर्ण नॉकआउट मुकाबले में अगर तेज गेंदबाजी बेअसर रही, तो सारा दारोमदार भारतीय बल्लेबाजों पर आ जाएगा।

2003 में भी टूटा था सपना : 2003 में सौरव गांगुली की कप्तानी ने भारतीय तेज गेंदबाजों के दम पर ही फाइनल तक का सफर तय किया था। उस पूरे टूर्नामेंट में हम सिर्फ दो मुकाबले हारे थे। यह दोनों ही मुकाबले ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ थे। पूरे टूर्नामेंट में जहीर, श्रीनाथ औरा नेहरा की तिकड़ी ने कुल 49 विकेट झटके थे।

फाइनल में गांगुली ने अपने तेज गेंदबाजों की जबर्दस्त फॉर्म को देखते हुए ही पहले गेंदबाजी का निर्णय लिया था, लेकिन तब भी हमारे तेज गेंदबाजों का एक खराब दिन हमें ले डूबा था और हमें उप विजेता बनकर संतोष करना पड़ा था।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal